Wednesday, April 24, 2013

आपके इष्ट देव : भाग्योदयकारी रत्न :आपके आराघ्य देव : जन्म का पाया :चमकती रहेगी आपकी किस्मत : Your favorite Dev:Deity worship :

-  आपके इष्ट देव -Your favorite Devista


* प्रार्थनाएं हमें मनुष्यता सिखाती हैं।
द्वारा: pratima avasthi  
प्रार्थना करने के फायदे
हमें अपने अनुभवों को बांटने का मौका देती हैं प्रार्थना। प्रार्थना हमारे आंतरिक परिवर्तनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, क्योंकि प्रार्थना हमारे महत्वपूर्ण वैयक्तिक बदलाव का बुनियादी केंद्र होती है। जब हम प्रार्थना करते हैं तो स्वीकार करते हैं कि कोई तो है, जो हम सबको रोशन किए हुए है। कोई तो है जिसके पास इस समूचे ब्रह्माण्ड का बटन है।
* जब हम प्रार्थना करते हैं तो अपने अहम का दमन करते हैं।
* जब प्रार्थना करते हैं तो हमारे मन से कलुषित विचार दूर होते चले जाते हैं। प्रार्थनाएं हीलिंग टच का काम करती हैं। प्रार्थनाएं हमें बल देती हैं, संबल देती हैं, क्योंकि प्रार्थनाएं हमें पवित्र बनाती हैं।

* हमारे शरीर को डिटॉक्सीफिकेशन करती हैं यानी उसे निर्विषीकरण की प्रक्रिया से गुजारती हैं। इससे हमारा शरीर स्वस्थ, पवित्र, प्रफुल्लित और तरोताजा होता है। प्रार्थनाएं हमें सिखाती हैं कि हम ऊर्जा कैसे हासिल करें।
* जो लोग प्रार्थना नहीं करते वे मौन में विलुप्त हो जाने का लुत्फ नहीं उठा पाते।

* प्रार्थना उस शक्ति को हासिल करने का उपक्रम है, जो शक्ति हमें अपने पराक्रम से हासिल होती है।
* प्रार्थनाएं हमें मनुष्यता सिखाती हैं।
* प्रार्थनाएं हमें संगठित करती हैं।
* प्रार्थनाएं हमें मिल-जुलकर कुछ भी कर सकने की शक्ति देती हैं। इसीलिए सामूहिक प्रार्थनाए महज धार्मिक क्रियाकलाप या अनुष्ठान भर नहीं होतीं, वे एक सामाजिक आंदोलन, एक वसुधैव कुटुम्बकम्‌ का आह्वान भी होती हैं।
* प्रार्थनाएं हमें दूसरों पर भरोसा करना सिखाती हैं।

इष्ट देव की उपासना/Deity worship
नीचे सभी राशियों के देवता दिए जा रहे हैं। अपनी राशि के अनुसार देवता की आराधना करे

मेष : हनुमान जी
वृषभ : दुर्गा माँ
मिथुन : गणपति जी
कर्क: शिव जी
सिंह : विष्णु जी (श्रीराम )
कन्या : गणेश जी
तुला : देवी माँ
वृश्चिक : हनुमान जी
धनु : विष्णु जी
मकर : शिव जी
कुम्भ : शिव का रूद्र रूप
मीन : विष्णु जी (सत्यनारायण भगवान)

  शास्त्रों की मान्यतानुसार अपने इष्ट देव की आराधना करने से मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं। आपके आराघ्य इष्ट देव कौन से होंगे इसे आप अपनी जन्म तारीख, जन्मदिन, बोलते नाम की राशि या अपनी जन्म कुंडली की लग्न राशि के अनुसार जान सकते हैं। जन्म माह : जिन्हें केवल जन्म का माह ज्ञात है, उनके लिए इष्ट देव इस प्रकार होंगे-
-जिनका जन्म जनवरी या नवंबर माह में हुआ हो वे शिव या गणेश की पूजा करें।


 -फरवरी में जन्मे शिव की उपासना करें।

 -मार्च , अगस्त दिसंबर में जन्मे व्यक्ति विष्णु की साधना करें।
-अप्रेल, सितंबर, अक्टूबर में जन्मे व्यक्ति गणेशजी की पूजा करें।
-मई व जून माह में जन्मे व्यक्ति मां भगवती की पूजा करें।
-जुलाई माह में जन्मे व्यक्ति विष्णु व गणेश का घ्यान करें।
जन्म वार से : जिनको वार का पता हो, परंतु समय का पता न हो, तो वार के अनुसार इष्ट देव इस प्रकार होंगे-


रविवार- विष्णु।
सोमवार- शिवजी।
मंगलवार- हनुमानजी
बुधवार- गणेशजी।
गुरूवार- शिवजी
शुक्रवार- देवी।
शनिवार- भैरवजी।
जन्म कुंडली से : जिनको जन्म समय ज्ञात हो उनके लिए जन्म कुंडली के पंचम स्थान से पूर्व जन्म के संचित कर्म, ज्ञान, बुद्धि, शिक्षा, धर्म व इष्ट का बोध होता है। अरूण संहिता के अनुसार व्यक्ति के पूर्व जन्म में किए गए कर्म के आधार पर ग्रह या देवता भाव विशेष में स्थित होकर अपना शुभाशुभ फल देते हैं।
राशि के आधार पर : पंचम स्थान में स्थित राशि के आधार पर आपके इष्ट देव इस प्रकार होंगे-
मेष: सूर्य या विष्णुजी की आराधना करें।
वृष: गणेशजी।


मिथुन: सरस्वती, तारा, लक्ष्मी।
कर्क: हनुमानजी।
सिंह: शिवजी।
कन्या: भैरव, हनुमानजी, काली।
तुला: भैरव, हनुमानजी, काली।
वृश्चिक: शिवजी।
धनु: हनुमानजी।
मकर: सरस्वती, तारा, लक्ष्मी।
कुंभ: गणेशजी।
मीन: दुर्गा, राधा, सीता या कोई देवी।
ग्रह के आधार पर इष्ट: पंचम स्थान में स्थित ग्रहों या ग्रह की दृष्टि के आधार पर आपके इष्ट देव।
सूर्य: विष्णु।
चंद्रमा- राधा, पार्वती, शिव, दुर्गा।
मंगल- हनुमानजी, कार्तिकेय।
बुध- गणेश, विष्णु।
गुरू- शिव।
शुक्र- लक्ष्मी, तारा, सरस्वती।
शनि- भैरव, काली।

As per astro uncle.
  इष्ट देव की उपासना/Deity worship

नीचे सभी राशियों के देवता दिए जा रहे हैं। अपनी राशि के अनुसार देवता की आराधना करे
मेष : हनुमान जी
वृषभ : दुर्गा माँ
मिथुन : गणपति जी
कर्क: शिव जी
सिंह : विष्णु जी (श्रीराम )
कन्या : गणेश जी
तुला : देवी माँ
वृश्चिक : हनुमान जी
धनु : विष्णु जी
मकर : शिव जी
कुम्भ : शिव का रूद्र रूप
मीन : विष्णु जी (सत्यनारायण भगवान)


प्रतिनिधि ग्रह-- इष्‍ट देव---- रत्न दान -----सामग्री
गुरु--------------- विष्‍णु-----पुखराज- ---पीली वस्तुएँ
शुक्र------------- देवी के रूप--- हीरा -----सफेद मिठाई
शनि------------- शिव जी----- नीलम ----काली वस्तुएँ
सूर्य--------- गायत्री, विष्णु---- माणिक--- सफेद वस्तुएँ, नारंगी
बुध------------- गणेश-------- पन्ना-------- हरी वस्तु
मंगल ---------हनुमानजी ------मूँगा------- लाल वस्तुएँ
चंद्र------------- शिवजी-------- मोती------- सफेद वस्तु
जन्म माह : जिन्हें केवल जन्म का माह ज्ञात है, उनके लिए इष्ट देव इस प्रकार होंगे-

-जिनका जन्म जनवरी या नवंबर माह में हुआ हो वे शिव या गणेश की पूजा करें।
-फरवरी में जन्मे शिव की उपासना करें।
-मार्च व दिसंबर में जन्मे व्यक्ति विष्णु की साधना करें।
-अप्रेल, सितंबर, अक्टूबर में जन्मे व्यक्ति गणेशजी की पूजा करें।
-मई व जून माह में जन्मे व्यक्ति मां भगवती की पूजा करें।
-जुलाई माह में जन्मे व्यक्ति विष्णु व गणेश का घ्यान करें।
जन्म वार से : जिनको वार का पता हो, परंतु समय का पता न हो, तो वार के अनुसार इष्ट देव इस प्रकार होंगे-
रविवार- विष्णु सोमवार- शिवजी। मंगलवार- हनुमानजी बुधवार- गणेशजी गुरूवार- शिवजी शुक्रवार- देवी
शनिवार- भैरवजी।
विशेष : संबंधित राशि के रत्न पहनने से और जप दान करने से अनुकूल फल प्राप्त होते हैं।

अगर आप किसी तीर्थ-स्थल पर जाकर पूजा-पाठ या दान-दक्षिणा करते हुए पुण्य कमाना चाहते हैं,

  इष्ट देव की उपासना/Deity worship

  ग्रह-- इष्‍ट देव


प्रतिनिधि ग्रह-- इष्‍ट देव---- रत्न दान -----सामग्री
गुरु--------------- विष्‍णु-----पुखराज- ---पीली वस्तुएँ
शुक्र------------- देवी के रूप--- हीरा -----सफेद मिठाई
शनि------------- शिव जी----- नीलम ----काली वस्तुएँ
सूर्य--------- गायत्री, विष्णु---- माणिक--- सफेद वस्तुएँ, नारंगी
बुध------------- गणेश-------- पन्ना-------- हरी वस्तु
मंगल ---------हनुमानजी ------मूँगा------- लाल वस्तुएँ
चंद्र------------- शिवजी-------- मोती------- सफेद वस्तु 


विशेष : राहु और केतु पर्वतों के खराब होने पर क्रमश:
सरस्वती और गणेश जी की आराधना करना लाभ देता है।
'ऊँ रां राहवे नम:' और 'ऊँ कें केतवे नम:' के जाप से भी ये ग्रह शां‍त होते हैं। 

  ;लग्नानुसार करें इष्ट देव की उपासना—-


भारतीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ईश्वरीय शक्ति की उपासना अलग-अलग रूपों में की जाती है। हिन्दू धर्म में तैंतीस करोड़ देवताओं को उपास्य देव माना गया है व विभिन्न शक्तियों के रूप में उनकी पूजा की जाती है।  आजकल परेशानियों, कठिनाइयों के चलते हम ग्रह शांति के उपायों के रूप में कई देवी-देवताओं की आराधना, मंत्र जाप एक साथ करते जाते हैं। परिणाम यह होता है कि किसी भी देवता को प्रसन्न नहीं कर पाते- जैसा कि कहा गया है –  ‘एकै साधै सब सधै, सब साधै सब जाय’ जन्मकुंडली के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के इष्ट देवी या देवता निश्चित होते हैं। यदि उन्हें जान लिया जाए तो कितने भी प्रतिकूल ग्रह हो, आसानी से उनके दुष्प्रभावों से रक्षा की जा सकती है।


 इष्ट देवता का निर्धारण कुंडली में लग्न अर्थात प्रथम भाव को देखकर किया जाता है।
 जैसे यदि प्रथम भाव में मेष राशि हो तो (1 अंक) तो लग्न मेष माना जाएगा।
  लग्नानुसार इष्ट देव——

 
 लग्न स्वामी ग्रह इष्ट देव  मेष, वृश्चिक मंगल हनुमान जी, राम जी वृषभ,
 तुला शुक्र दुर्गा जी  मिथुन, कन्या बुध गणेश जी, विष्णु
 कर्क चंद्र शिव जी सिंह सूर्य गायत्री, हनुमान जी धनु/ मीन गुरु विष्णु जी (सभी रूप), लक्ष्मी जी
  मकर, कुंभ शनि हनुमान जी, शिव जी लग्न के अतिरिक्त पंचम व नवम भाव के स्वामी ग्रहों के अनुसार देवी-देवताओं का ध्यान पूजन भी सुख-सौहार्द्र बढ़ाने वाला होता है। 


इष्ट देव की पूजा करने के साथ रोज एक या दो माला मंत्र जाप करना चमत्कारिक फल दे सकता है और आपकी संकटों से रक्षा कर सकता है। 
देव मंत्र —- हनुमान—- ऊँ हं हनुमंताय नम: शिव—- ऊँ रुद्राय नम: गणेश —ऊँ गंगणपतयै नम: दुर्गा— ऊँ दुं दुर्गाय नम:  राम —-ऊँ रां रामाय नम:  विष्णु— विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ लक्ष्मी— लक्ष्मी चालीसा,…ऊँ श्रीं श्रीयै नम:  विशेष : इष्ट का ध्यान-जप का समय

निश्चित होना चाहिए अर्थात यदि आप सुबह सात बजे जप ध्यान करते हैं, तो रोज उसी समय ध्यान करें। अपनी सुविधानुसार समय न बदलें।  
व्यक्ति यदि अपने लग्र के देवता की पूजा करें तो उनको अपने हर काम में सफलता मिलने लगेगी।
 मेष लग्र- मेष लग्र में जन्म लेने वाले लोगों को रवि, मंगल, गुरु, ये ग्रह शुभ फल देते हैं। इसलिए इन लोगों को रवि और गणेश जी की आराधना करनी चाहिए।


 वृषभ लग्र- इस लग्र वाले को शनि देव की उपासना करनी चाहिए।
मिथुन लग्र- लग्र पर जिनका जन्म होगा उनको शुक्र फल देता है। इसलिए वे कुल देवता की उपासना करें।
 कर्क लग्र- कर्क लग्र वाले लोगों को गणेश जी और शंकर भगवान की उपासना करनी चाहिए।

  सिंह लग्र- सिंह लग्र में वाले कुलदेवता का पूजन करें।
  कन्या लग्र- कन्या लग्र वाले लोगों को शुक्र शुभफल देता है। इसलिए कुलदेवता की आराधना करें।
 तुला लग्र- तुला लग्र वाले जातकों को ग्रहों की उपासना करनी चाहिए।
  वृश्चिक लग्र- वृश्चिक लग्र वाले लोगों के लिए भी ग्रहों की पूजा शुभ फल देने वाली होती है।
धनु लग्र- इस लग्र पर जिनका जन्म होता है। उन्हे सूर्य और गणेश की आराधना करनी चाहिए।
 मकर लग्र- मकर लग्र वाले जातकों को अपनी कुलदेवी और कुबेर की उपासना करनी चाहिए।
  कुंभ लग्र- कुंभ लग्र वालों के लिए भी कुल देवी की ही आराधना शुभकारी होती है।
 मीन लग्र- इस लग्र वाले शंकर और गणपति जी की भक्ति करें   श्री गणेश : मात्र पत्तों से ही खुश होने वाले देवता गणेश जी ही ऐसे देवता हैं, जिनकी पूजा घास-फूस अपितु पेड़-पौधों की पत्तियों से भी करके उनका आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है। श्री विनायक को प्रसन्न करने के लिए इन पर मात्र पत्तों को भी अर्पित किया जा सकता है।

कुंडली से इष्ट देव जानने का सूत्र। किसी जातक की कुंडली से इष्ट देव जानने के अलग अलग सूत्र व सिद्धांत समय समय पर ऋषि मुनियों ने बताये व सम्पादित किये हैं।
जेमिनी सूत्र के रचयिता महर्षि जेमिनी इष्टदेव के निर्धारण में आत्मकारक ग्रह की भूमिका को सबसे अधिक मह्त्व्यपूर्ण बताया है।
कुंडली में लगना, लग्नेश, लग्न नक्षत्र के स्वामी एवं ग्रह जों सबसे अधिक अंश में हो चाहे किसी भी राशि में हो आत्मकारक ग्रह होता है।
इष्ट देव कैसे चुने?
अपना इष्ट देव चुनने में निम्न बातों का ध्यान देना चाहिए।
-आत्मकारक ग्रह के अनुसार ही इष्ट देव का निर्धारण व उनकी अराधना करनी चाहिए।
-अन्य मतानुसार पंचम भाव, पंचमेश व पंचम में स्थित बलि ग्रह या ग्रहों के अनुसार ही इष्ट देव का निर्धारण व अराधना करें।
-त्रिकोणेश में सर्वाधिक बलि ग्रह के अनुसार भी इष्टदेव का चयन कर सकते हैं और उसी अनुसार उनकी अराधना करें।
ग्रह अनुसार देवी देवता का ज्ञान
सूर्य-राम व विष्णु
चन्द्र-शिव, पार्वती, कृष्ण
मंगल-हनुमान, कार्तिकेय, स्कन्द, नरसिंग
बुध-गणेश, दुर्गा, भगवान् बुद्ध
वृहस्पति-विष्णु, ब्रह्मा, वामन
शुक्र-परशुराम, लक्ष्मी
शनि-भैरव, यम, कुर्म, हनुमान
राहु-सरस्वती, शेषनाग
केतु-गणेश व मत्स्य
इस प्रकार अपने इष्ट देव का चयन करने के उपरांत किसी भी जातक को उनकी पूजा अराधना करनी चाहिए तथा उसके बाद भी आपको धर्मीं कार्य, अनुष्ठान, जाप, दान आदि निरंतर करते रहना चाहिए। आप इन्हें किसी भी परिस्थिति में ना त्यागें। अपने इष्ट देव का निर्धारण कर यदि आप नियमित पूजा अराधना करते हैं तो आपको आपने पूर्वजन्म कृत पापों से मुक्ति मिलने में सहायता हो जाती है।
 ibn7
 आपके इष्ट देव
शास्त्रों की मान्यतानुसार अपने इष्ट देव की आराधना करने से मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं। आपके आराघ्य इष्ट देव कौन से होंगे इसे आप अपनी जन्म तारीख, जन्मदिन, बोलते नाम की राशि या अपनी जन्म कुंडली की लग्न राशि के अनुसार जान सकते हैं।

जन्म माह : जिन्हें केवल जन्म का माह ज्ञात है, उनके लिए इष्ट देव इस प्रकार होंगे-
-जिनका जन्म जनवरी या नवंबर माह में हुआ हो वे शिव या गणेश की पूजा करें।


-फरवरी में जन्मे शिव की उपासना करें।
-मार्च व दिसंबर में जन्मे व्यक्ति विष्णु की साधना करें।
-अप्रेल, सितंबर, अक्टूबर में जन्मे व्यक्ति गणेशजी की पूजा करें।
-मई व जून माह में जन्मे व्यक्ति मां भगवती की पूजा करें।
-जुलाई माह में जन्मे व्यक्ति विष्णु व गणेश का घ्यान करें।
patrica 
लग्नानुसार करें इष्ट देव की उपासना
भारती पंडित
भारतीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ईश्वरीय शक्ति की उपासना अलग-अलग रूपों में की जाती है। हिन्दू धर्म में तैंतीस करोड़ देवताओं को उपास्य देव माना गया है व विभिन्न शक्तियों के रूप में उनकी पूजा की जाती है।


आजकल परेशानियों, कठिनाइयों के चलते हम ग्रह शांति के उपायों के रूप में कई देवी-देवताओं की आराधना, मंत्र जाप एक साथ करते जाते हैं। परिणाम यह होता है‍ कि किसी भी देवता को प्रसन्न नहीं कर पाते- जैसा कि कहा गया है -
'एकै साधै सब सधै, सब साधै सब जाय'
जन्मकुंडली के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति के इष्ट देवी या देवता निश्चित होते हैं। यदि उन्हें जान लिया जाए तो कितने भी प्रतिकूल ग्रह हो, आसानी से उनके दुष्प्रभावों से रक्षा की जा सकती है। इष्ट देवता का निर्धारण कुंडली में लग्न अर्थात प्रथम भाव को देखकर किया जाता है। जैसे यदि प्रथम भाव में मेष राशि हो तो (1 अंक) तो लग्न मेष माना जाएगा।
लग्नानुसार इष्ट देव
लग्न स्वामी ग्रह इष्ट देव
मेष, वृश्चिक मंगल हनुमान जी, राम जी
वृषभ, तुला शुक्र दुर्गा जी
मिथुन, कन्या बुध गणेश जी, विष्णु
कर्क चंद्र शिव जी
सिंह सूर्य गायत्री, हनुमान जी
धनु, मीन गुरु विष्णु जी (सभी रूप), लक्ष्मी जी
मकर, कुंभ शनि हनुमान जी, शिव जी
लग्न के अतिरिक्त पंचम व नवम भाव के स्वामी ग्रहों के अनुसार देवी-देवताओं का ध्यान पूजन भी सुख-सौहार्द्र बढ़ाने वाला होता है। इष्ट देव की पूजा करने के साथ रोज एक या दो माला मंत्र जाप करना चमत्कारिक फल दे सकता है और आपकी संकटों से रक्षा कर सकता है।
देव मंत्र
हनुमान ऊँ हं हनुमंताय नम:
शिव ऊँ रुद्राय नम:
गणेश ऊँ गंगणपतयै नम:
दुर्गा ऊँ दुं दुर्गाय नम:
राम ऊँ रां रामाय नम:
विष्णु विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ
लक्ष्मी लक्ष्मी चालीसा
ऊँ श्रीं श्रीयै नम:
विशेष : इष्ट का ध्यान-जप का समय निश्चित होना चाहिए अर्थात यदि आप सुबह सात बजे जप ध्यान करते हैं, तो रोज उसी समय ध्यान करें। अपनी सुविधानुसार समय न बदलें

किसको ईष्ट बनाए & आपके इष्ट देव कौन हैं?
शास्त्रों की मान्यतानुसार अपने इष्ट देव की आराधना करने से मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं। आपके आराघ्य इष्ट देव कौन से होंगे इसे आप अपनी जन्म तारीख, जन्मदिन, बोलते नाम की राशि या अपनी जन्म कुंडली की लग्न राशि के अनुसार जान सकते हैं।
जन्म माह : जिन्हें केवल जन्म का माह ज्ञात है, उनके लिए इष्ट देव इस प्रकार होंगे-


-जिनका जन्म जनवरी या नवंबर माह में हुआ हो वे शिव या गणेश की पूजा करें। फरवरी में जन्मे शिव की उपासना करें। मार्च व दिसंबर में जन्मे व्यक्ति विष्णु की साधना करें। अप्रेल, सितंबर, अक्टूबर में जन्मे व्यक्ति गणेशजी की पूजा करें। मई व जून माह में जन्मे व्यक्ति मां भगवती की पूजा करें। जुलाई माह में जन्मे व्यक्ति विष्णु व गणेश का घ्यान करें।
जन्म वार से : जिनको वार का पता हो, परंतु समय का पता न हो, तो वार के अनुसार इष्ट देव इस प्रकार होंगे-
रविवार- विष्णु सोमवार- शिवजी। मंगलवार- हनुमानजी बुधवार- गणेशजी गुरूवार- शिवजी शुक्रवार- देवी
शनिवार- भैरवजी।
राशि के आधार पर : पंचम स्थान में स्थित राशि के आधार पर आपके इष्ट देव इस प्रकार होंगे-
मेष: सूर्य या विष्णुजी की आराधना करें। वृष: गणेशजी। मिथुन: सरस्वती, तारा, लक्ष्मी। कर्क: हनुमानजी। सिंह: शिवजी। कन्या: भैरव, हनुमानजी, काली। तुला: भैरव, हनुमानजी, काली। वृश्चिक: शिवजी धनु: हनुमानजी। मकर: सरस्वती, तारा, लक्ष्मी। कुंभ: GANESH JI मीन: दुर्गा, राधा, सीता या कोई देवी।
जन्म कुंडली से : जिनको जन्म समय ज्ञात हो उनके लिए जन्म कुंडली के पंचम स्थान से पूर्व जन्म के संचित कर्म, ज्ञान, बुद्धि, शिक्षा, धर्म व इष्ट का बोध होता है। अरूण संहिता के अनुसार व्यक्ति के पूर्व जन्म में किए गए कर्म के आधार पर ग्रह या देवता भाव विशेष में स्थित होकर अपना शुभाशुभ फल देते हैं।
ग्रह के आधार पर इष्ट: पंचम स्थान में स्थित ग्रहों या ग्रह की दृष्टि के आधार पर आपके इष्ट देव।
सूर्य: विष्णु।चंद्रमा- राधा, पार्वती, शिव, दुर्गा।मंगल- हनुमानजी, कार्तिकेय।बुध- गणेश, विष्णु गुरू- शिव। शुक्र- लक्ष्मी, तारा, सरस्वती। शनि- भैरव, काली।
 यह ब्लॉग मैंने अपनी रूची के अनुसार बनाया है इसमें जो भी सामग्री दी जा रही है वह मेरी अपनी नहीं है कहीं न कहीं से ली गई है। अगर किसी के कॉपी राइट का उल्लघन होता है तो मुझे क्षमा करें।मैं हर इंसान के लिए ज्योतिष के ज्ञान के प्रसार के बारे में सोच कर इस ब्लॉग को बनाए रख रहा हूँ।
आपके इष्ट देव -Your favorite Dev
  शास्त्रों की मान्यतानुसार अपने इष्ट देव की आराधना करने से मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं। आपके आराघ्य इष्ट देव कौन से होंगे इसे आप अपनी जन्म तारीख, जन्मदिन, बोलते नाम की राशि या अपनी जन्म कुंडली की लग्न राशि के अनुसार जान सकते हैं। जन्म माह : जिन्हें केवल जन्म का माह ज्ञात है, उनके लिए इष्ट देव इस प्रकार होंगे-


-जिनका जन्म जनवरी या नवंबर माह में हुआ हो वे शिव या गणेश की पूजा करें।

 -फरवरी में जन्मे शिव की उपासना करें।
 -मार्च व दिसंबर में जन्मे व्यक्ति विष्णु की साधना करें।
-अप्रेल, सितंबर, अक्टूबर में जन्मे व्यक्ति गणेशजी की पूजा करें।
-मई व जून माह में जन्मे व्यक्ति मां भगवती की पूजा करें।
-जुलाई माह में जन्मे व्यक्ति विष्णु व गणेश का घ्यान करें।
जन्म वार से : जिनको वार का पता हो, परंतु समय का पता न हो, तो वार के अनुसार इष्ट देव इस प्रकार होंगे-
रविवार- विष्णु।
सोमवार- शिवजी।
मंगलवार- हनुमानजी
बुधवार- गणेशजी।
गुरूवार- शिवजी
शुक्रवार- देवी।
शनिवार- भैरवजी।

जन्म कुंडली से : जिनको जन्म समय ज्ञात हो उनके लिए जन्म कुंडली के पंचम स्थान से पूर्व जन्म के संचित कर्म, ज्ञान, बुद्धि, शिक्षा, धर्म व इष्ट का बोध होता है। अरूण संहिता के अनुसार व्यक्ति के पूर्व जन्म में किए गए कर्म के आधार पर ग्रह या देवता भाव विशेष में स्थित होकर अपना शुभाशुभ फल देते हैं।
राशि के आधार पर : पंचम स्थान में स्थित राशि के आधार पर आपके इष्ट देव इस प्रकार होंगे-
मेष: सूर्य या विष्णुजी की आराधना करें।
वृष: गणेशजी।
मिथुन: सरस्वती, तारा, लक्ष्मी।
कर्क: हनुमानजी।
सिंह: शिवजी।
कन्या: भैरव, हनुमानजी, काली।
तुला: भैरव, हनुमानजी, काली।
वृश्चिक: शिवजी।
धनु: हनुमानजी।
मकर: सरस्वती, तारा, लक्ष्मी।
कुंभ: गणेशजी।
मीन: दुर्गा, राधा, सीता या कोई देवी।
ग्रह के आधार पर इष्ट: पंचम स्थान में स्थित ग्रहों या ग्रह की दृष्टि के आधार पर आपके इष्ट देव।
सूर्य: विष्णु।
चंद्रमा- राधा, पार्वती, शिव, दुर्गा।
मंगल- हनुमानजी, कार्तिकेय।
बुध- गणेश, विष्णु।
गुरू- शिव।
शुक्र- लक्ष्मी, तारा, सरस्वती।
शनि- भैरव, काली।

As per astro uncle.
 

त्रिज्येष्ठ-दोष Trijyeshth Dosh


 विवाह में किसी भी प्रकार से तीन ज्येष्ठ मिलें, तो यह त्रिज्येष्ठ नामक दोष होता है।  ज्येष्ठे मासि कर ग्रहों न शुभकृत ज्येष्ठांगना पुत्रयो: ज्येष्ठे मास्यपि जातयोश्च यदि वा ज्येष्ठोडुसम्भूतयो:। दम्पत्योर्यदि येन केन विधिना ज्येष्ठत्रयं चास्ति चेत् त्रिज्येष्ठाहय दोषदो हि सततं नाप्याद्य गर्भद्वये।।  अर्थात् सबसे बड़ी संतान (पुत्र-पुत्री) का ज्येष्ठ मास में विवाह अशुभ है। ज्येष्ठ मास व ज्येष्ठा नक्षत्र में उत्पन्न वर-कन्या का विवाह भी ज्येष्ठ मास में नहीं करें।  ज्येष्ठ लड़का व ज्येष्ठ लड़की (सबसे बड़े बेटा-बेटी) तथा ज्येष्ठ मास ये तीनों त्रिज्येष्ठ दोषप्रद हैं। अत: तीनों की स्थिति होने पर विवाह नहीं करें।  जन्म मास व जन्म नक्षत्र में विवाह वर्जित है। इस प्रकार ज्येष्ठ मास तथा ज्येष्ठा नक्षत्र में उत्पन्न बालक का विवाह भी ज्येष्ठ मास में नहीं करें। ज्येष्ठ वर या कन्या में से कोई एक ज्येष्ठ हो, तो ज्येष्ठ मास में विवाह करने पर कोई दोष नहीं होता है।  गर्ग ऋषि के मतानुसार ज्येष्ठ लड़की का विवाह ज्येष्ठ लड़के के साथ नहीं करें।


Ways to be free from Loans - ऋण मुक्तिके उपाय   -चर लग्न मेष, कर्क, तुला व मकर में कर्ज लेने पर शीघ्र उतर जाता है। लेकिन, चर लग्न में कर्जा दें नहीं। चर लग्न में पांचवें व नवें स्थान में शुभ ग्रह व आठवें स्थान में कोई भी ग्रह नहीं हो, वरना ऋण पर ऋण चढ़ता चला जाएगा।  -किसी भी महीने की कृष्णपक्ष की 1 तिथि, शुक्लपक्ष की 2, 3, 4, 6, 7, 8, 10, 11, 12, 13 पूर्णिमा व मंगलवार के दिन उधार दें और बुधवार को कर्ज लें।  -कर्ज मुक्ति के लिए ऋणमोचन मंगल स्तोत्र का पाठ करें एवं लिए हुए कर्ज की प्रथम किश्त मंगलवार से देना शुरू करें। इससे कर्ज शीघ्र उतर जाता है।  -कर्ज लेने जाते समय घर से निकलते वक्त जो स्वर चल रहा हो, उस समय वही पांव बाहर निकालें तो कार्य सिद्धि होती है, परंतु कर्ज देते समय सूर्य स्वर को शुभकारी माना है।  -कर्जनाशक ताम्रपत्र पर मंगल यंत्र (भौम यंत्र) अभिमंत्रित करके पूजा करें या सवा चार रत्ती का मूंगायुक्त कर्ज मुक्ति मंगल यंत्र अभिमंत्रित करके गले में धारण करें।  -लाल मसूर की दाल का दान दें।  -वास्तु अनुसार ईशान कोण को स्वच्छ व साफ रखें।  -वास्तुदोष नाशक हरे रंग के गणपति मुख्य द्वार पर आगे-पीछे लगाएं।  -हनुमानजी के चरणों में मंगलवार व शनिवार के दिन तेल-सिंदूर चढ़ाएं और माथे पर सिंदूर का तिलक लगाएं। हनुमान चालीसा या बजरंगबाण का पाठ करें।  -ऋणहर्ता गणेश स्तोत्र का शुक्लपक्ष के बुधवार से नित्य पाठ करें।  -बुधवार को सवा पाव मूंग उबालकर घी-शक्कर मिलाकर गाय को खिलाने से शीघ्र कर्ज से मुक्ति मिलती है।  -सरसों का तेल मिट्टी के दीये में भरकर, फिर मिट्टी के दीये का ढक्कन लगाकर किसी नदी या तालाब के किनारे शनिवार के दिन सूर्यास्त के समय जमीन में गाड़ देने से कर्ज मुक्त हो सकते हैं।  -सर्व सिद्धि बीसा यंत्र धारण करने से सफलता मिलती है।  -सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का नित्य एकादश पाठ करें।  -घर की चौखट पर अभिमंत्रित काले घोड़े की नाल शनिवार के दिन लगाएं।  -हस्त नक्षत्र रविवार की संक्रांति के वृद्धि योग में कर्जा उतारने से मुक्ति मिलती है।

 भाग्योदयकारी रत्न   राशि अथवा लग्नानुसार लग्नेश Bhagyodaykari Gem Stones -



[प्रथम भाव] पंचमेश एवं नवमेश के रत्न धारण करने से सफलता मिलती है। उक्त रत्नों से संबंधित लॉकेट पहनने से भी ग्रह बाधा का निवारण हो सकता है। विभिन्न लग्नों के अनुसार भाग्योदयकारी रत्नों का चयन आप कर सकते हैं।      राशि/लग्न भाग्योदय कारक रत्न मेष मूंगा, माणिक्य, पुखराज वृषभ हीरा, पन्ना, नीलम मिथुन पन्ना, हीरा, नीलम कर्क मोती, मूंगा, पुखराज सिंह माणिक्य, पुखराज, मूंगा कन्या पन्ना, नीलम, हीरा तुला हीरा, नीलम, पन्ना वृश्चिक मूंगा, पुखराज, मोती धनु पुखराज, मूंगा, माणिक्य मकर नीलम, हीरा, पन्ना कुंभ नीलम, पन्ना, हीरा मीन पुखराज, मोती, मूंगा  अपने भाग्योदयकारक रत्नों की अंगूठी बनाकर शुभ मुहूर्त में पहन लें। रत्न पहनने से पहले अंगूठी या लॉकेट को कच्चे दूध से धोकर शुद्ध कर लें।
Aaradhya Dev - आपके आराघ्य देव :  



 अरबी ज्योतिष में पासों जिन्हें कुरा कहते हैं। इनसे बनने वाली आकृति के आधार पर आप यह जान सकते हैं कि आपके आराघ्य देव/इष्ट कौन से हैं। अपने इष्ट की साधना शीघ्र फलीभूत होती है और सुख-समृद्धि, सफलता इत्यादि भी जल्दी मिलती है। जीवन प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होता है।  रमल (अरबी ज्योतिष) में जातक यानी कि प्रश्नकर्ता रमल ज्योतिष के विद्वान से प्रश्न करें कि किस देवी-देवता की आराधना करें। जिससे लाभ, शांति, पारिवारिक बढ़त, भौतिक, संपदा, धन-धान्य में वृद्धि, शांति, तथा संतान सुख प्राप्त हो। आराघ्य देव की जानकारी के लिए पासे जिसे अरबी भाषा में "कुरा" कहते हैं, किसी शुद्ध पवित्र स्थान पर डलवाए जाते हैं। यह सारी प्रक्रिया विद्वान के समक्ष होती है। यदि आप विद्वान के पास नहीं जा सकते तो "प्रश्न-फार्म" के माघ्यम से भी इस कार्य को संपादित किया जा सकता है। अरबी ज्योतिष में किए गए सारे प्रश्नों के जवाब मय समाधान बिना कुंडली सेहल किए जाते हैं।   अरबी ज्योतिष में 12 राशियां, नौ ग्रह और 27 नक्षत्र माने गए हैं। यह विधा 12 राशियों पर आधारित है जिनका संबंध मूल सात ग्रहों से है। हर राशि का अपना एक अधिष्ठाता देवता होता है। अरबी ज्योतिष के प्रस्तार के लग्न स्थान में यदि शक्ल (आकृति) हमरा नकी हो जो मेष और वृश्चिक राशि से संबंध रखती है तो आपके आराघ्य देव हनुमानजी होंगे। इसकी आराधना से शांति, लाभ, वैभव व दुश्मन परास्त होकर नत मस्तक होंगे या शांत होकर घर बैठ जाएंगे।  यदि लग्न स्थान में शक्ल अतवे दाखिल व फरह शक्ल हो जो वृष व तुला राशि को निर्धारित करती है। यह आकृति होने पर जातक को लक्ष्मी मां की आराधना से लाभ प्राप्ति होगी। मां लक्ष्मी की कृपा आप पर बनी रहेगी। साथ ही ख्याति लाभ व धन वैभव मिलेगा। प्रस्तार के लग्न स्थान में शक्ल इज्जतमा व जमात हो जो कि मिथुन व कन्या राशि की शक्ल से संबंधित है, होने पर जातक को विष्णु भगवान की आराधना करना श्रेष्ठकर रहेगा। इनकी आराधना करने से परिवार और संतान सुख व शांति मिलेगी।  यदि लग्न स्थान में शक्ल ब्याज, तरीक हो जो कि चंद्रमा ग्रह की और कर्क राशि की शक्ल है, तो जातक को शिव भगवान की आराधना करना लाभकारी है। इनकी आराधना से धन-धान्य की पूर्ति के साथ यश मान मिलेगा। साथ ही ईश्वर की अदृश्य शक्ति की कृपा बराबर बनी रहेगी।  यदि लग्न स्थान में शक्ल कब्जूल दाखिल, नुस्तुल खारिज हो जो सिंह राशि से संबंधित है, होने पर जातक को सूर्य देव व शिवजी महाराज की आराधना करना हितकर है। यदि लग्न स्थान में शक्ल लहियान, नुस्तुल दाखिल हो जो धनु व मीन राशि से संबंधित है, होने पर जातक को श्रीराम, श्रीकृष्ण, नारायण देव की आराधना करना उपयोगी है। इनकी आराधना से संतान सुख, परिवार में सुख-शांति बराबर स्थायी तौर पर कायम रहेगी। परिवार में वंश वृद्धि नियमानुसार होती रहेगी। यदि लग्न स्थान में शक्ल कब्जुल खारिज, अंकिश, उपला, अतवे खारिज शक्ल हो जो कुंभ व मकर राशि से संबंधित है, होने पर जातक को शिवजी की आराधना करना हितकर है। इससे परिवार व कार्य में स्थाई तौर पर बरकत, वैभव-शांति मिलेगी।Food and Fragrances - आहार एवं सुगंध   किसी भी ग्रह की प्रतिकूलता व्यक्ति को अशांत बना देती है। ग्रह संबंधी आहार या सुगंध का प्रयोग करके आप प्रतिकूल ग्रह को अनुकूल बना सकते हैं। शास्त्रों में ग्रहों की प्रकृति के अनुसार उनके आहार और सुगंधों का उल्लेख मिलता है। इनमें नौ ग्रहों के अलग-अलग आहार और सुगंध हैं। जिनका प्रयोग करके हम ग्रहजनित दोषों के प्रभाव में कमी ला सकते हैं।    ग्रह संबंधी आहार और सुगंध  - सूर्य की अनुकूलता के लिए आप अपने आहार में केसर, गेहूं, आम, चिकने पदार्थ तथा शहद का उपयोग कर लें। केसर तथा गुलाब के इत्र के उपयोग से भी सूर्य की अनुकूलता प्राप्त होती है।  - चंद्रमा की अनुकूलता के लिए गन्ना, सफेद गुड़, शक्कर, दूध या दूध से बने पदार्थ या सफेद रंग की मिठाई का सेवन करें। चमेली तथा रातरानी का परफ्यूम या इत्र चंद्र संबंधी पीड़ा को शांत करता है।  - मंगल की पीड़ा को कम करने के लिए आप अपने आहार में मूंग, मसूर की दाल, प्याज, गुड़, अचार, जौ या सरसों का उपयोग करें। लाल चंदन के इत्र या तेल के प्रयोग से भी मंगल प्रसन्न होते हैं।  - बुध को इलायची सर्वाधिक प्रिय है। मटर, ज्वार, मोठ, कुलथी, हरी दालें, मूंग, हरी सब्जियां बुध के दोष को कम करती हैं। चंपा के इत्र या तेल के प्रयोग से बुध प्रसन्न होते हैं।   -बृहस्पति की कृपा के लिए चने की दाल, बेसन, मक्का, केला, हल्दी, सेंधा नमक, पीली दालों का प्रयोग कर लें। पीले फूल, केसर या केवड़े का दूध प्रयोग करने से बृहस्पति की कृपा प्राप्त होगी।  - शुक्र की कृपा प्राप्ति के लिए त्रिफला, दालचीनी, कमल गट्टे, मिश्री, मूली या सफेद शलजम का उपयोग आहार में करते रहें। सफेद फूल, चंदन या कपूर की सुगंध शुभ फलदायी है। चंदन के तेल में कपूर डालकर उपयोग करना भी श्रेष्ठ रहता है।  - शनि की कृपा प्राप्त करने के लिए तिल, उड़द की दाल, काली मिर्ची, अलसी एवं मूंगफली का तेल, अचार, लौंग, तेजपत्ता तथा काले नमक का उपयोग आहार में करें। कस्तूरी, लोबान तथा सौंफ की सुगंध शनि को अति पसंद है। - राहु एवं केतु की पीड़ा से बचने के लिए उड़द, तिल तथा सरसों का प्रयोग लाभदायक होता है। काली गाय का घी, कस्तूरी की सुगंध इन्हें प्रिय है।  - रविवार को उड़द, सोमवार को खीर या दूध, मंगलवार को चूरमा या हलुवा, बुध को हरी सब्जी, गुरूवार को पीले चने की दाल या बेसन का प्रयोग, शुक्रवार को मीठा दही, शनि को चने का सेवन करने से सभी ग्रहों की शांति होती है।

 Birth Paya : जन्म का पाया  



 जब भी किसी बच्चे का जन्म होता है, तब माता-पिता और परिजनों का पहला प्रश्न यही होता है कि बच्चे का जन्म किस पाए में हुआ है। पाए के अनुसार ही बच्चे के शुभाशुभ फल की जानकारी प्राप्त होती है। पाए चार प्रकार के होते हैं। लोहा, तांबा, चांदी व सोना। इनमें से चांदी व तांबे का पाया सर्वश्रेष्ठ होता है। मतांतर से कहीं तांबे का, तो कहीं चांदी का पाया सर्वश्रेष्ठ मानते हैं। इसके बाद सोने का पाया शुभ एवं लोहे का पाया अशुभ माना गया है। पाया देखने की दो रीतियां प्रमुख हैं। पहला जब बच्चे का जन्म हुआ, उस समय चंद्रमा किस भाव में है। इसे चंद्र विधि कहते हैं। दूसरा नक्षत्र के आधार पर।   चांदी: आद्राü, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा, मघा, पू.फा., उ.फा. हस्त चित्रा, स्वाति।  तांबा: पू.षा. उ.षा., श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पू.भा., उ.भा.।  सोना: रेवती, अश्विनी, भरणी, कृतिका, रोहिणी, मृगशिरा।  लोहा: विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल।  चंद्र विधि: जन्म के समय चंद्रमा 1, 6, 11 भाव में हो, तो सोने का पाया। 2, 5, 9 भाव में चांदी, 3, 7, 10 भाव में तांबा और 4, 8, 12 भाव में लोहा का पाया होता है।

 Turmali : तुरमली   तुरमली नाम से प्रसिद्ध उपरत्न को संस्कृत में "शोभामणि" अथवा "विक्रांत" के नाम से जाना जाता हैं। अंग्रेजी में इसे "टूरमेलीन" कहते हैं। तुरमली को हीरे का उपरत्न माना जाता हैं परंतु सभी तुरमली हीरे की प्रभावपूर्ति नहीं करते हैं। कारण कि उसमें वर्ण भिन्नता पाई जाती है। हीरे की रश्मियों में आंशिक साम्य केवल इंडिकोलाइट तुरमली" कर पाता है। इसकी आभा हल्के नीले रंग की होती है। अन्य तुरमली अपना-अपना एक भिन्न वर्ण रखते हैं। यह कभी पारदर्शी, कभी ठोस मिलता है। प्रत्येक पत्थर दोहरा रंग, दोहरी आभा बिखेरता है। चमक, ज्वलंतता और सौंदर्य की दृष्टि से सभी तुरमली आभूषणों में जड़ने योग्य होते हैं। रंग और आभा के आधार पर   तुरमली के ये भेद माने जाते हैं- क्राइसोलाइट (सीलोन तुरमली)- यह पत्थर हरापन लिए हुए कुछ पीला (धानी, सूआपंखी) जैसा होता है।   ब्राजील पन्ना- शुद्ध हरे रंग का तुरमली "ब्राजील पन्ना" कहलाता है। रू बी लाइट- लाल या गुलाबी रंग का तुरली "रू बी लाइट" कहलाता है।   साइबेराइट- बैंगनी या लालिमायुक्त मिश्रित बैंगनी रंग वाला पत्थर "साइबेराइट" नाम से जाना जाता है।   शोर्ल- काले रंग का तुरमली शोर्ल कहलाता है। जिस तुरमली की संरचना में लौह-तत्व नहीं होता, वह सबसे अधिक चमकता है। कांच की तरह चमकने वाला तुरमली रगड़ने या गरम करने पर चुम्बकीय गुणों से युक्त हो उठता है। उस समय यह हल्की चीजों, कागज के टुकड़ों आदि को अपनी ओर खींच लेता है।


लग्न के अनुसार मंत्र का जप -इष्ट को मनाएँ उनके ही मंत्र से—
इष्ट का बड़ा महत्व होता है। यदि इष्ट का साथ मिल जाए तो जीवन की मुश्किलें आसान होता चली जाती हैं। कुंडली में कितने भी कष्टकर योग हो, इष्ट की कृपा से जीवन आसान हो जाता है। अतः हर व्यक्ति को अपने इष्ट और उसके मन्त्र की जानकारी होना जरूरी है।
लग्न कुंडली का नवम भाव इष्ट का भाव होता है और नवम से नवम होने से पंचम भाव इष्ट का भाव माना जाता है। इस भाव में जो राशि होती है उसके ग्रह के देवता ही हमारे इष्ट कहलाते है। उनका मंत्र ही इष्ट मन्त्र कहलाता है। यहाँ लग्न के अनुसार आपके इष्टदेव और उनके मंत्र की जानकारी दी जा रही है।
मेष लग्न के इष्ट देव हैं विष्णु जी – मंत्र- ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय
वृषभ लग्न के इष्ट हैं गणपति जी – मंत्र- ऊँ गं गणपतये नमः
मिथुन लग्न की इष्टदेवी हैं माँ दुर्गा – मंत्र- ऊँ दुं दुर्गाय नमः
कर्क लग्न के इष्ट हैं हनुमान जी – मंत्र- ऊँ हं हनुमंताय नमः
सिंह लग्न के इष्ट है विष्णु जी – मंत्र- ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय
कन्या लग्न के इष्ट हैं शिव जी – मंत्र-ऊँ नमः शिवाय
तुला लग्न के इष्ट हैं रूद्र जी – मंत्र- ऊँ रुद्राय नमः
वृश्चिक लग्न के इष्ट होंगे विष्णु जी – मंत्र- ऊँ गुं गुरुवे नमः , ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय

धनु लग्न के इष्ट है हनुमान जी – मंत्र- ऊँ हं हनुमंताय नमः
मकर लग्न की इष्ट है देवी भगवती – मंत्र- ऊँ दुं दुर्गाय नमः
कुम्भ लग्न के इष्ट है गणपति जी – मंत्र- ऊँ गं गणपतये नमः
मीन लग्न के इष्ट हैं शिव जी – मंत्र- ऊँ नमः शिवाय
विशेष : इष्ट मंत्र का जाप नियमित रूप से और रोज एक निश्चित समय पर ही करना चाहिए। विशेष अवसर पर इष्ट पूजन के बाद ही कार्य प्रारम्भ करना चाहिए।
मेष और मीन लग्न वालों को क्रमशः गायत्री मंत्र और ऊँ प्रां प्रीं प्रौं सह चन्द्रमसे नमः का जाप करना भी लाभ देता है।
राशि के अनुसार देवता को मनाएँ : करियर चमकाएँ —-
अच्छा करियर सचमुच सभी की जरुरत होता है। यह लाइन सेफ हो जाए तो जीवन की आधी प्रॉब्लम दूर हो जाती है। क्या एस्ट्रो में भी ऐसे उपाय हैं जिनको करने से करियर बनाने में मदद मिल सके? आइए देखते हैं :
कुंडली का दसवा भाव और दसवें से दसवा यानी सातवाँ भाव नौकरी या व्यवसाय को दिखाते हैं। दसवाँ भाव ज्यादा इसके लिए जिम्मेदार होता है। आपको करना क्या है .. अपनी कुंडली का दसवाँ भाव देखिए और उसमें कौनसी राशि आ रही है उस पर ध्यान दीजिए। उस राशि का स्वामी ग्रह कौनसा है यह भी देखें। क्या यह प्लेनेट मजबूत है यानी इसके साथ कोई बुरा ग्रह तो नहीं है या किसी बुरे ग्रह की नजर तो नहीं है?
यदि ऐसा है तो ग्रह कमजोर माना जाएगा। इसी तरह यदि इस ग्रह के साथ सन है तो भी यह ग्रह अस्त यानी कम पावर का माना जाएगा। अब ऐसा ग्रह आपको सही दिशा नहीं दे सकता अतः इस ग्रह को मनाना आपके लिए जरूरी है।
इसी तरह लगे हाथों सातवें भाव पर भी नजर डाल लें और इसके ग्रह को भी जाँच लें। अगर यह ठीक है तो आपको केवल दसवें भाव को ठीक करना है।
नीचे सभी राशियों के देवता दिए जा रहे हैं। अपनी राशि के अनुसार देवता की आराधना करे और मनचाहा करियर पाएँ—

मेष : हनुमान जी
वृषभ : दुर्गा माँ
मिथुन : गणपति जी
कर्क: शिव जी
सिंह : विष्णु जी (श्रीराम )
कन्या : गणेश जी
तुला : देवी माँ
वृश्चिक : हनुमान जी
धनु : विष्णु जी
मकर : शिव जी
कुम्भ : शिव का रूद्र रूप
मीन : विष्णु जी (सत्यनारायण भगवान)
विशेष : संबंधित राशि के रत्न पहनने से और जप दान करने से अनुकूल फल प्राप्त होते हैं।
अगर आप किसी तीर्थ-स्थल पर जाकर पूजा-पाठ या दान-दक्षिणा करते हुए पुण्य कमाना चाहते हैं,


कई बार जन्म कुण्डली न होने या जन्म समय, स्थान आदि की सही जानकारी न होने से कई आवश्यक बातों का पता नहीं चलता। ऐसे में मूलांक यानि अंक ज्योतिष सही आधार हो सकता है जिसके द्वारा आप कई समस्याओं का समाधान जान सकते हैं।
मूलांक के आधार पर आप अपने भाग्योदय के वर्ष भी जान सकते हैं। इन वर्षों के बारे में यदि आपको पता हो तो उनकी पहले से तैयारी की जा सकती है और समय आने पर अवसर को कैश किया जा सकता है।

मूलांक 1 वालों का भाग्यशाली वर्ष 22 वाँ वर्ष होता है। इस वर्ष से इन्हें सफलता मिलनी प्रारंभ हो जाती है।
मूलांक 2 वालों के लिए 24 वाँ वर्ष विशेष फलकारक होता है।
मूलांक 3 वालों के लिए 32 वाँ वर्ष अति फलदायी होता है।
मूलांक 4 के लिए 36 और 42 वें वर्ष अति शुभ होते है व अटूट धन संपत्ति कारक होते हैं।
मूलांक 5 के लिए 32 वाँ वर्ष बहुत अच्छा होता है। सफलता के द्वार खुलते जाते हैं।
मूलांक 6 के लिए 25 वाँ वर्ष शुभता लेकर आता है। हर कार्य में सफलता कदम छूती है।
मूलांक 7 के लिए 38 व 44 व वर्ष शुभ होता है। प्रारम्भ के संघर्ष के बाद खूब सफलता मिलती है।
मूलांक 8 के लिए 36 व 42 वें वर्ष अति शुभ होते हैं। इन्हें पहले खूब मेहनत करनी पड़ती है, फिर लाभ मिलता है।
मूलांक 9 के लिए 28 वाँ वर्ष बहुत शुभ होता है और खूब यश-धन दिलाता है।

विशेष : भाग्योदय का वर्ष जानने के बाद अपने मूलांक से मिलाती-जुलती फील्ड चुननी चाहिए और खूब मेहनत करनी चाहिए ताकि अवसर आने पर आप उसका उपयोग कर सके और धन-यश का मजा लूट सकें।

भाग्यशाली वर्ष में तो भाग्य वृद्धि होती ही है, फिर इनके गुणक वर्षों में भी सफलता मिलती जाती है। जैसे मूलांक 1 को 22 वें वर्ष के अलावा 33, 44, 55, 66 वें वर्ष में भी विशेष सफलता मिलती है। इसी तरह अन्य मूलांक के गुणक वर्ष निकाले जा सकते हैं।

क्या है मूलांक और भाग्यांक – भारती पंडित
मूलांक और भाग्यांक हमारी लाइफ में बड़ा महत्व रखते हैं। कई बार हमें जन्म का समय या स्थान मालूम नहीं होता। ऐसे में कुंडली बना पाना कठिन हो जाता है। मूलांक उन लोगों के लिए एक सटीक आधार है। अपने बारे में जानने का और भविष्य में घटने वाली घटनाओं का अनुमान लगाने का अंक ज्योतिष एक सरल माध्यम हो सकता है।
मूलांक का अर्थ है —
आपके जन्म की तारीख। यानि यदि आपका जन्म 2 मार्च को हुआ है तो आपका मूलांक 2 होगा। मूलांक हमारे स्वभाव, प्रकृति, गुण,दोष आदि के बारे बताता है। हमारे लिए जीवन में क्या उपयोगी है और क्या अनुपयोगी, यह मूलांक से ही जाना जाता है। यह आपके मित्र और शत्रुओं के बारे में भी बताता है।

आपके करियर, जीवनसाथी, कार्यक्षेत्र और भाग्योदय की भी जानकारी देता है। मूलांक 1 से 9 तक माने जाते हैं। जिन लोगों का जन्म 9 से अधिक संख्या वाली तारीख को हुआ है वे अपने जन्मदिनांक को आपस में जोड़कर मूलांक पा सकते हैं। जैसे जिनका जन्म 11 तारीख को हुआ है उनका मूलांक 2 होगा। (1+1=2)। इसी तरह अन्य मूलांक आपस में जोड़कर निकाले जा सकते हैं।
भाग्यांक :- ——

भाग्यांक की गणना थोड़ी विस्तृत होती है। यह वह अंक होता है जो आपके जीवन में बार-बार किसी न किसी तरह आता ही है और आपको अच्छे या बुरे रूप में प्रभावित करता है।

भाग्यांक का उपयोग महत्वपूर्ण घटनाओं का समय या तिथि जानने के लिए किया जाता है। आजकल जो नाम का अक्षर बदलने का चलन चल रहा है, वह भी भाग्यांक के ही आधार पर किया जाता है।
भाग्यांक निकलने के लिए जन्म तारीख, माह और सन लिखा जाता है और फिर उनका योग किया जाता है। जैसे यदि आपकी जन्म तारीख, माह व सन 2-3-1970 है तो आपका भाग्यांक 2+3+1+9+7+0 =22 = 2+2 = 4 होगा। यानि इस पूरी डीटेल्स के लिए भाग्यांक 4 होगा। विवाह, काम करने की जगह, भाग्यशाली शहर, लकी अंक आदि के बारे में भाग्यांक के द्वारा ही जाना जाता है।
कुंडली से ऐसे जानिए अपने इष्टदेव को!
आईबीएन-7 |

। कुंडली से इष्ट देव जानने का सूत्र। किसी जातक की कुंडली से इष्ट देव जानने के अलग अलग सूत्र व सिद्धांत समय समय पर ऋषि मुनियों ने बताये व सम्पादित किये हैं।
जेमिनी सूत्र के रचयिता महर्षि जेमिनी इष्टदेव के निर्धारण में आत्मकारक ग्रह की भूमिका को सबसे अधिक मह्त्व्यपूर्ण बताया है।
कुंडली में लगना, लग्नेश, लग्न नक्षत्र के स्वामी एवं ग्रह जों सबसे अधिक अंश में हो चाहे किसी भी राशि में हो आत्मकारक ग्रह होता है।
इष्ट देव कैसे चुने?


अपना इष्ट देव चुनने में निम्न बातों का ध्यान देना चाहिए।
-आत्मकारक ग्रह के अनुसार ही इष्ट देव का निर्धारण व उनकी अराधना करनी चाहिए।
-अन्य मतानुसार पंचम भाव, पंचमेश व पंचम में स्थित बलि ग्रह या ग्रहों के अनुसार ही इष्ट देव का निर्धारण व अराधना करें।
-त्रिकोणेश में सर्वाधिक बलि ग्रह के अनुसार भी इष्टदेव का चयन कर सकते हैं और उसी अनुसार उनकी अराधना करें।
ग्रह अनुसार देवी देवता का ज्ञान
सूर्य-राम व विष्णु
चन्द्र-शिव, पार्वती, कृष्ण
मंगल-हनुमान, कार्तिकेय, स्कन्द, नरसिंग
बुध-गणेश, दुर्गा, भगवान् बुद्ध
वृहस्पति-विष्णु, ब्रह्मा, वामन
शुक्र-परशुराम, लक्ष्मी
शनि-भैरव, यम, कुर्म, हनुमान
राहु-सरस्वती, शेषनाग
केतु-गणेश व मत्स्य


इस प्रकार अपने इष्ट देव का चयन करने के उपरांत किसी भी जातक को उनकी पूजा अराधना करनी चाहिए तथा उसके बाद भी आपको धर्मीं कार्य, अनुष्ठान, जाप, दान आदि निरंतर करते रहना चाहिए। आप इन्हें किसी भी परिस्थिति में ना त्यागें। अपने इष्ट देव का निर्धारण कर यदि आप नियमित पूजा अराधना करते हैं तो आपको आपने पूर्वजन्म कृत पापों से मुक्ति मिलने में सहायता हो जाती है। जन्मकुंडली द्वारा इष्टदेव की पूजा कर लाभ उठायें.......
यदि पंचम भाव में पुरुष ग्रह तो देवता की आराधना करनी चाहिए ।
तथा स्त्री ग्रह हो तो देवी की आराधना करनी चाहिए ।


१-पचम भाव में सूर्य हो तो जातक को सूर्य या शिव जी की उपासना करना चाहिए ।
२-पचम भाव में चन्द्रमा या शुक्र हो तो जातक को गौरी या लक्ष्मी की उपासना करना चाहिए ।
३-पचम भाव में मंगल हो तो जातक को गणेश , कार्तिकेय या हनुमान जी उपासना करना चाहिए ।
४-पचम भाव में बुध हो तो जातक को राम , कृष्ण या विष्णु जी की उपासना करना चाहिए ।
५ -पचम भाव में गुरु हो तो जातक को शिव जी की उपासना करना चाहिए
६-पचम भाव में शनि, राहू, केतु हो तो जातक को भैरव या क्षुद्र देवता की उपासना करना चाहिए ।
७ - यदि पंचमेश { पचम भाव का स्वामी } लग्नेश का मित्र हो तो उपरोक्त देवता की आराधना से
 कार्य परिपूर्ण होगा ।
इसके अलावा अपने लग्न के अनुसार भी अपने ईष्ट देव जान सकते है...
1.मेष लग्न – सूर्य,दत्तात्रेय , गणेश
2. वृषभ- कुलदेव ,शनि
3. मिथुन-कुलदेव , कुबेर
4. कर्क- शिव, गणेश
5. सिंह- सूर्य
6. कन्या- कुलदेव
7. तुला- कुलदेवी
8. वृश्चिक- गणेश
9 धनु- सूर्य ,गणेश
10. मकर - कुबेर,हनुमंत,कुलदेव,शनि
11. कुम्भ- शनि, कुलदेवी,हनुमान
12. मीन- दत्तात्रेय,शिव,गणेश


यदि जन्मकुंडली में निम्न बली ग्रह हो........
सूर्य तो व्यक्ति शक्ति उपासना कर अभीष्ट पाता है,
चंद्र हो तो तामसी साधनों में रूचि रखता है,
मंगल हो शिव उपासना,
बुध हो तो तंत्र साधना में,
गुरु हो तो साकार ब्रह्मोपासना में,
शुक्र हो तो मंत्र साधना में,
शनि हो तो मन्त्र तंत्र में निष्णात व विख्यात होता है.
इसी प्रकार जन्म कुंडली के भावों का भी विचार करें....
प्रथम भाव या चंद्रमा पर शनि की दृष्टि हो तो जातक सफल साधक होता है.
चंद्रमा नवम भाव में किसी भी ग्रह की दृष्टि से रहित हो तो व्यक्ति श्रेष्ट सन्यासी होता है.
दशम भाव का स्वामी सातवे घर में हो तो तांत्रिक साधना में सफलता मिलती है
नवमेश यदि बलवान होकर गुरु या शुक्र के साथ हो तो सफलता मिलती ही है.


दशमेश दो शुभ ग्रहों के मध्य हो तब भी सफलता प्राप्त होती है .
यदि सभी ग्रह चंद्रमा और ब्रहस्पति के मध्य हो तो तंत्र के बजाय मंत्र साधना ज्यादा अनुकूल रहती है .
केन्द्र या त्रिकोण में सभी ग्रह हो तो प्रयत्न करने पर सफलता मिलती ही है.
गुरु, मंगल और बुध का सम्बन्ध बनता हो तो सफलता मिलती है .
शुक्र व बुध नवम भाव में हो तो ब्रह्म साक्षात्कार होता है.
सूर्य उच्च का होकर लग्न के स्वामी के साथ हो तो व्यक्ति श्रेष्ट साधक होता है .
लग्न के स्वामी पर गुरु की दृष्टि हो तो मन्त्र मर्मज्ञ होता है
दशम भाव का स्वामी दशम में ही हो तो साकार साधनों में सफलता मिलती है.
दशमेश शनि के साथ हो तो तामसी साधनों में सफलता मिलती है.
राहु अष्टम का हो तो व्यक्ति अद्भुत व गोपनीय तंत्र में प्रयत्नपूर्वक सफलता पा सकता है.
पंचम भाव से सूर्य का सम्बन्ध बन रहा हो तो शक्ति साधना में सफलता मिलती है.


नवम भाव में मंगल का सम्बन्ध तो शिवाराधक होकर सफलता पाता है.
नवम में शनि स्वराशि स्थित हो तो वृद्धावस्था में व्यक्ति प्रसिद्द सन्यासी बनता है.
इस प्रकार सभी को विचार करके अपने ईष्ट देव जी का चयन करें तत्पश्चात उनकी आराधना करने से लाभ प्राप्त करें..
रोज सुबह करेंगे ये 5 काम तो दिनभर चमकती रहेगी आपकी किस्मत
धर्म डेस्क |
रोज सुबह करेंगे ये 5 काम तो दिनभर चमकती रहेगी आपकी किस्मत
उज्जैन। ऐसा माना जाता है कि दिन की शुरुआत अच्छी हो तो पूरे दिन सब अच्छा ही अच्छा होता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए प्राचीन समय से ही कुछ परंपराएं बनाई गई हैं। इन परंपरागत कामों को नियमित रूप से करने पर चमत्कारी रूप से शुभ फल प्राप्त होते हैं। यहां जानिए पांच परंपरागत काम, जो रोज सुबह-सुबह करना चाहिए... इन कामों से आप दिनभर भाग्यशाली बने रह सकते हैं...
दही खाकर निकलें
घर से निकलने से पहले दही का सेवन अवश्य करना चाहिए। यह परंपरा काफी पुराने समय से चली आ रही है। दही को पवित्र माना जाता है। इसकी पवित्रता और स्वाद से मन प्रसन्न होता है। इसी वजह से इसे पूजन सामग्री में भी खास स्थान प्राप्त है। दही खाने से विचार सकारात्मक होते हैं और नकारात्मक विचारों से मुक्ति मिल जाती है। आप चाहें तो दही में चीनी भी मिला सकते हैं।
तुलसी का पूजन करें और इसके पत्तों का सेवन करें
सामान्यत: तुलसी का पौधा सभी के घरों में होता है। शास्त्रों के अनुसार तुलसी को पवित्र और पूजनीय माना जाता है। जिस घर में तुलसी का पूजन प्रतिदिन होता है, वहां महालक्ष्मी की कृपा बनी रहती है। पैसों से संबंधित परेशानियां घर में नहीं रहती हैं। तुलसी एक औषधीय पौधा भी है। प्रतिदिन तुलसी के पत्तों का सेवन करने से कई रोगों से बचाव हो जाता है। साथ ही, तुलसी से पुण्य लाभ भी प्राप्त होते हैं।
घर के मंदिर में विराजित भगवान का दर्शन करें
घर के मंदिर में विराजित देवी-देवताओं के दर्शन प्रतिदिन करना चाहिए। घर से निकलने से पहले एक बार इनके सामने कार्यों में सफलता की प्रार्थना की जाए तो व्यक्ति का दिन शुभ रहता है। भगवान की कृपा बनी रहती है।
घर से निकलने से पहले सीधा पैर बाहर रखें
किसी भी कार्य का प्रारंभ सीधे हाथ और सीधे पैर को आगे बढ़ाकर किया जाए तो सफलता मिलने की संभावनाएं काफी बढ़ जाती हैं। शास्त्रों के अनुसार यदि धार्मिक कर्म सीधे हाथ से किए जाएं तो अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। ठीक इसी प्रकार घर से निकलने से पहले सीधा पैर बाहर रखते हैं तो यह शुभ शकुन होता है। ऐसा करने पर कार्यों के प्रति सकारात्मक सोच भी बनती है।
माता-पिता एवं बुजुर्गों का आशीर्वाद लें
प्रतिदिन घर से निकलने से पहले माता-पिता का आशीर्वाद लेना चाहिए। जिन लोगों से उनके माता-पिता प्रसन्न रहते हैं, उनसे सभी देवी-देवता भी प्रसन्न रहते हैं। इसके विपरीत जो लोग माता-पिता का सम्मान नहीं करते और उन्हें दुख देते हैं, वे कभी भी सुख प्राप्त नहीं कर पाते हैं। अत: घर से निकलने से पूर्व माता-पिता और बुजुर्गों के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लेना बहुत शुभ होता है। माता-पिता के आशीर्वाद से सभी प्रकार की बुरी बलाएं दूर हो जाती हैं और कार्यों में सफलता के योग बनते हैं।
सुबह उठकर यह काम भूलकर भी नहीं करें दिन भर परेशान रहेंगे

दिन की शुरुआत अच्छी हो तो पूरा दिन अच्छा रहता है। और आप यह कभी नहीं चाहेंगे कि आपका दिन उलझन और परेशानियों में बीते। लेकिन आपने महसूस किया होगा कि कभी-कभी दिन ऐसा बीतता है कि समय पर न तो भोजना मिलता है और न मन का चैन। प्राचीन मान्यता और शास्त्रों के अनुसार इसका असली कारण सुबह के समय की गई गलतियां हैं।
शास्त्रों के अनुसार सुबह उठकर कभी भी आईने में अपनी सूरत नहीं देखनी चाहिए। इससे पूरे दिन नकारात्मक उर्जा का प्रभाव अपने उपर बना रहता है। सुबह नींद खुलते ही किसी व्यक्ति का चेहरा भी देखने से बचना चाहिए।
इसका कारण यह है कि हर व्यक्ति में एक उर्जा का संचार होता है। सुबह जब नींद खुलती है तो आपका शरीर स्थिल होता है और आप दूसरे की उर्जा के प्रभाव में जल्दी आ जाते हैं। अगर कोई नकारात्मक उर्जा के प्रभाव में है तो आप भी इसके प्रभाव में आ जाते हैं।
इसलिए सबसे पहले अपने ईष्ट देवता का ध्यान करें और उनके दर्शन करें। अगर ऐसा संभव नहीं हो तो अपनी हथेली देखकर भगवान का ध्यान करें। इससे आत्मबल बढ़ेगा और सकारात्मक उर्जा का संचार होगा।


एक बात और ध्यान रखने की जरुरत है कि सुबह के समय भोजन करने से पहले पशु या किसी गांव का नाम नहीं लेना चाहिए। इससे भी दिन प्रतिकूल हो जाता है। खास तौर पर बंदर तो बिल्कुल भी नहीं बोलें।
रामचरित मानस के सुंदरकंड में साफ-साफ लिखा है हनुमान जी कहते हैं मैं जिस कुल से यानी बानर कुल से हूं और जो कोई सुबह-सुबह मेरा नाम लेता है उसे उस दिन समय पर भोजन नहीं मिलता है। 'प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥' इसका मतलब यह नहीं कि आप हनुमान जी का नाम नहीं लें। हनुमान जी का खूब नाम लें लेकिन बानर शब्द नहीं बोलें।

लक्ष्मी की प्राप्ति के सरल उपाय :steps the achievement of Lakshmi

लक्ष्मी की प्राप्ति के सरल उपाय
दान  से ग्रह के प्रभाव कम  होते हैं। शुक्र और गुरु को धन देने वाला ग्रह माना गया है।

- गाय पर शुक्र ग्रह का प्रभाव रहता  है।
-  गाय के लिए भोजन की पहली रोटी निकालना चाहिए।
- पीपल के वृक्ष में गुरु का वास होता  है। पीपल के वृक्ष को  पानी देना और  परिक्रमा करनी चाहिए।

-  वृद्धजन भी गुरु ग्रह के कारतत्व में आते हैं घर के वृद्धजनों की सेवा और मान-सम्मान करने से गुरु ग्रह स्थिति ठीक होती है। 

प्रातः उठते ही हस्तदर्शन  कर दोनों हथेलियों को 2-3 बार मुंह पर फीराना चाहिये।
-धन या व्यापार से संबंधीत लेन-देन के खाते पर या पत्र व्यवहार करते समय हल्दी या केशर लगायें।
-प्रतिदिन भोजन के लिए बनी पहली रोटी गाय को खिलाये।
-शुक्रवार को सफेद वस्तुओं का दान
चाहिये
-प्रात : काल  झाडू अवश्य लगाये।
-रात को झूठे बर्तन, कचरा इत्यादि रसोई में नहीं रखना
चाहिये
-प्रतिदिन संध्या समय घर पर पूजा  करे।
-घर में किसी भी देवी देवता कि एक से ज्यादा तस्वीर,मूर्ति पूजा स्थान मे नहीं रखनी
चाहिये
-जरुरत मंद व्यक्ति, गरिबो को यथा सक्ति मदद
,दान करना चाहिये।-पुरानी, रद्दी भंगार ,शनिवार के दिन घर से बाहर निकालना  चाहिये।
-शनिवार के दिन काले रंग कि वस्तु, स्टील, लोहा इत्यादि उपहार में नहीं लेना है ।
-किसी कार्य के लिये जाते समय खाली पेट कभी भी घर से ना जाए । -स्थिर लक्ष्मी कि कामना हेतु रुपया-पैसा-पीले कपडे में लपेटकर रखें।
-वर्ष में कम से कम एक बार परिवार के साथ तीर्थ यात्रा अवश्य करें।

-अशोक का पेड़ लगाकर उसको सींचने से धन में वृद्धि होती हैं।-
- सुबह मुख्य दरवाजे के बाहर से झाडू से सफाई करके थोडा पानी छिड़कने से घर में सुख समृद्धि होती हैं।- व्यय भाव में अशुभ ग्रह ग्रह होने से दरिद्रता आती है।
-बारहवें भाव के स्वामी ग्रह का दान करना चाहिए।

- मंगल होने पर- बंदर को चना खिलाना चाहिए।
-  गुरु होने पर- विद्वान व्यक्ति को शिक्षा सामग्री  दान करना चाहिए।
-  शनि होने पर - काले कीड़े को  भुना हुआ आटा डालना चाहिए।
-  सूर्य होने पर - लाल मुँह के बंदर को खाद्य सामग्री देना चाहिए।
- राहु होने पर -  कोढ़ी, गूँगे-बहरेव्यक्ति को दान देना चाहिए।
- केतु होने पर - लंगड़े, अपंग व्यक्ति को दान व  सहयोग करना चाहिए।
- बहू-बेटियों पर भी शुक्र का कारतत्व है। नारी जाति का सम्मान कर बहन-बेटियों की मदद करना चाहिए। अपनी जन्म पत्रिका के छठे व व्यय भाव से संबंधित ग्रहों की जानकारी ज्योतिषी  से लेकर ,संबंधित दान, जप, पूजन, करना चाहिए।
-छठे भाव के ग्रह का दान करने से रोग, कर्ज व शत्रु कम होते हैं तथा व्यय भाव से संबंधित दान करने से मुसीबतै में कमी आती है।  धन व समृद्धि बढ़ेगी ही।  इस तरह  सरल दान, जप करने से प्रत्येक घर में सुख-समृद्धि आती है और
लक्ष्मी का वास होता है।

दीपावली के अत्यंत सरल और अचूक उपाय लक्ष्मी कृपा पाने के :
यहां लक्ष्मी कृपा पाने के लिए 51 से ज्यादा उपाय बताए जा रहे हैं और ये उपाय सभी राशि के लोगों द्वारा किए जा सकते हैं। यदि आप चाहे तो इन उपायों में से कई उपाय भी कर सकते हैं या सिर्फ कोई पांच उपाय भी कर सकते हैं।
 जानने  के लिए :लिंक को क्लिक करें
https://www.facebook.com/ShreeSiddhiVinyakJyotishAvmVaastuPramershKendra

Friday, April 19, 2013

वास्तु ज्ञान --बाथरूम में नमक रखने से नेगेटिविटी दूर होगी:Keep some Salt in the Bathroom to Kill Negative Energy



 बाथरूम में नमक रखने से नेगेटिविटी दूर होगी:Keep some Salt in the Bathroom to Kill Negative Energy

हमारे घर का मुंह पूरब की तरफ है। इसके बावजूद मेरे जीवन में कोई शांति नहीं है। हमने जबसे इस मकान में शिफ्ट किया है, तभी से मैं इमोशनली, मेंटली और फाइनेंशली समस्याएं झेल रहा हूं। कृपया कोई उपाय बताइए।
आपके घर का नक्शा देखा। इसमें बहुत कम बदलाव करने की जरूरत है, लेकिन आपने सारी चीजों को मिसमैनेज किया हुआ है। इससे आपका घर वास्तु के नियमों के विपरीत हो गया है। यह पॉजिटिव एनर्जी को बर्बाद करने की तरह है। अगर आपने इनका ध्यान रखा होता है, तो पॉजिटिव एनर्जी आपके घर में रहकर आपको लाभ दे सकती थीं। आपके घर का मुंह पूरब की तरफ है, जो बहुत शुभ होता है। इसके अलावा उत्तर दिशा में खुली जगह का होना भी वास्तु के अनुसार काफी शुभ है। पूरब मुंहाना होते हुए भी आपको वास्तु का लाभ इसलिए नहीं मिल रहा है, क्योंकि घर के एकदम बाहर बड़े-बड़े पेड़ पॉजिटिव एनर्जी का रास्ता रोक रहे हैं। घर में दो कमरे पेंटागन आकार के हैं। ये वास्तु के नियमों के विपरीत हैं। आपने घर में बोरिंग भी फायर जोन यानी दक्षिण-पूर्व दिशा में कराई है, जो गलत है। मंदिर को भी गलत जगह पर रखा गया है।


सबसे पहले बोरिंग को उत्तर-पूर्व या उत्तर दिशा में शिफ्ट करने की कोशिश करें। इससे घर के आर्थिक हालात सुधरेंगे। घर में समृद्धि लाने के लिए आप इस हिस्से में अंडरग्राउंड वॉटर टैंक भी बनवा सकते हैं। आपके घर में पूजा घर और टॉयलेट्स बराबर में बने हुए हैं। यह वास्तु के हिसाब से बिल्कुल गलत है। आपको घर के मंदिर में ऊर्जावान 91 ग्रिड पिरामिड रखना चाहिए। इसके अलावा मंदिर में मूर्ति का मुंह दक्षिण या पश्चिम की तरफ रखें, जबकि पूजा करते समय आपका मुंह पूर्व की तरफ होना चाहिए। बाथरूम में नमक का कटोरा रखें। इससे घर की नेगेटिव एनर्जी को बैलेंस करने में मदद मिलेगी। किचन की दीवार पर पूरब दिशा में एक बड़ा शीशा टांगने से घर में स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां दूर होंगी। घर की बाहरी दीवार पर अष्टकोणीय शीशा इस तरह टांगें कि इसमें पेड़ों का अक्स दिखाई दे। इससे द्वार वेध दोष दूर होगा। 


astrouncle_tips.blogspot.com

The correct way of suggesting the remedy is as follows./effects of all planets in the chart.

The correct way of suggesting the remedy is as follows.

The correct way of suggesting the remedy is as follows.

•           First Determine the overall bad and good effects of all planets in the chart.
•           Next determine the strength of all those planets.
•           Next determine what is causing the trouble. A weak but good planet or a strong but malefic planet.
•           If both of the above cases are present then choose the weak but the good planet for remedy.
•           If weak but good panet is picked for remedy, determine if that planet is capable of producing bad effects for any house.
Check the strength of that house, if the house is otherwise strong proceed, otherwise also include in your remedy the good planet for that chart to protect that house.
•           If strong but malefic planet is picked up for remedy, determine if that planet (specially the houses on which that planet lords over) is good for any house. Repeat the same check as explained above to make the affected house stronger.
•           Finally check the dasha scheme, check the relationship of the planet with the dasha lord and see if they are compatible. If not compatible then suggest a remedy for the dasha lord instead of the planet in question.

As you can see the results will really vary chart to chart. That's why no remedy works the same way for all the poople. Remedies do work, but determine the right remedy takes real skill and years of experience.  

  DISCLAIMER This Blog is created to provide you the Tips & Tricks, Best General Tips & Knowledge, Religious Content in Hindi. The Articles in this blog are collected from various Newspapers, TV Channels and other sources and does not warrant or assume any legal liability or responsibility for the accuracy, completeness or usefulness of the information provided here.I am maintaining this blog with the thought of spreading the knowledge of Astrology to every human being Please check with a Vastu expert or an Astrologer before using any of the suggestions given in this Blog.To delete copyright contents if any please email us, we'll remove relevant contents immediately.

Thursday, April 18, 2013

उपाय : अकाल मृत्यु का योग है तो उसे टालने के लिए ज्योतिषीय उपाय :घोड़े की नाल के दस प्रयोगः/- Horseshoe ten Pryogः /upay

अकाल मृत्यु का योग है तो उसे टालने के लिए ज्योतिषीय उपाय भी बताए गए हैं।
सभी जानते हैं कि मृत्यु एक अटल सत्य है और इसे कोई बदल नहीं सकता। कब, किस कारण से, किसकी मौत होगी, यह बात भी कोई सामान्य व्यक्ति बता नहीं सकता है। कुछ लोगों की मृत्यु कम उम्र में ही या अचानक किसी दुर्घटना में हो जाती है। ऐसी मौत को अकाल मृत्यु कहते हैं।

ज्योतिष के अनुसार किसी व्यक्ति की मृत्यु से जुड़ी खास बातें मालूम की जा सकती है। कुंडली के योगों को देखकर यह मालूम हो जाता है कि संबंधित व्यक्ति की मृत्यु किस उम्र में होगी और कैसे होगी। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में अकाल मृत्यु का योग है तो उसे टालने के लिए ज्योतिषीय उपाय भी बताए गए हैं। हालांकि, ज्योतिष के अनुसार मृत्यु के संबंध में संभावित जानकारी ही मालूम हो पाती है।

यहां जानिए कुंडली के योग जो असमय मृत्यु की ओर इशारा करते हैं…
यदि किसी व्यक्ति की कुंडली के लग्न भाव में मंगल स्थित हो और उस पर सूर्य या शनि की या इन दोनों ग्रहों की दृष्टि पड़ रही हो तो दुर्घटना में मृत्यु होने की आशंका रहती है।
राहु-मंगल की युति या दोनों ग्रहों का समसप्तक होकर एक-दूसरे पर दृष्टि डालना भी दुर्घटना का कारण बनता है। जिस व्यक्ति की कुंडली में ऐसा होता है, उसे वाहन आदि सावधानी से चलाना चाहिए।
कुंडली में षष्ठम भाव का स्वामी पापग्रह से युक्त होकर षष्ठम अथवा अष्टम भाव में स्थित हो तो दुर्घटना में मृत्यु होने का भय रहता है।
कुंडली के लग्न भाव, द्वितीय भाव तथा बारहवें भाव में कोई क्रूर ग्रह स्थित हो तो व्यक्ति की हत्या या दुर्घटना में मृत्यु हो सकती है।
यदि कुंडली में दशम भाव की नवांश राशि का स्वामी राहु अथवा केतु के साथ स्थित हो तो व्यक्ति की मृत्यु स्वभाविक नहीं होती है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति की मृत्यु दुर्घटना में हो सकती है।
यदि कुंडली में लग्न भाव का स्वामी तथा मंगल, दोनों की युति छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो तो व्यक्ति किसी शस्त्र घात से मृत्यु को प्राप्त होता है। ऐसी संभावनाएं काफी रहती हैं। इसी प्रकार का फल इन भावों में शनि और मंगल के होने से भी प्राप्त होता है।
यदि कुंडली में मंगल द्वितीय भाव, सप्तम भाव अथवा अष्टम भाव में स्थित हो और उस पर सूर्य की पूर्ण दृष्टि पड़ रही हो तो व्यक्ति की मृत्यु आग से होने संभावनाएं रहती हैं।

इन अशुभ योगों से बचने के उपाय…
शिवपुराण के अनुसार असमय या अचानक होने वाली मृत्यु से बचने के लिए शनिदेव की पूजा सर्वश्रेष्ठ उपाय है। शनि देव असमय मृत्यु से बचाने में सक्षम हैं। शनि को प्रसन्न करने के लिए सर्वश्रेष्ठ दिन है शनिवार। इस दिन भगवान शनि के निमित्त पूजन करने वाले व्यक्ति को असमय मृत्यु का भय नहीं रहता है। साथ ही, कुंडली के कई दोष भी शांत हो जाते हैं।
सबसे क्रूर माने जाने वाले शनि से कृपा प्राप्त करने के लिए शनिवार के दिन विशेष पूजन करें। शनि के निमित्त शनि की वस्तुओं का दान करें। इसके अतिरिक्त भगवान शिव को जल में तिल डालकर अर्पित करें। शिवजी के साथ ही शनिदेव की आराधना से व्यक्ति अकाल मृत्यु से बच सकता है।
इस प्रकार प्रत्येक शनिवार को यह उपाय करने से अकाल मृत्यु का खतरा टल जाता है और व्यक्ति को लंबी आयु प्राप्त होती है। यह उपाय शिवपुराण में दिया गया है।
शास्त्रों के अनुसार यमराज को मृत्यु का देवता माना गया है। जब किसी व्यक्ति की मृत्यु का समय आ जाता है तो उसकी आत्मा को लेने के लिए यमराज या यमदूत आते हैं। यमराज आने का अर्थ है साक्षात मृत्यु का आना। मृत्यु के भय को समाप्त करने के लिए शास्त्रों में कई उपाय बताए गए हैं। इन्हीं उपायों में से एक है घर में तुलसी का पौधा लगाना। यदि महामृत्युंजय मंत्र का जप किया जाए तब भी अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति प्राप्त हो जाती है।
प्रतिदिन शिवलिंग पर जल चढ़ाएं, फिर अक्षत और बिल्वपत्र चढ़ाएं। इस दौरान महामृत्युंजय मंत्र का जप करते रहें।
महाकालेश्वर मृत्यु के भय को दूर करने वाले भगवान हैं, अत: प्रतिदिन इनकी आराधना इस मंत्र से करें: ऊँ महाकालेश्वरराय विद्महे, महादेवाय धीमही, तन्नौ रुद्र: प्रचोदयात्।
काल को जीतने वाले महादेव के रुद्राष्टक का पाठ करें।
कुंडली के दूषित ग्रह का सही उपचार कराएं।

{कुमार प्रखर}

घोड़े की नाल के दस प्रयोगः




 घोड़े की नाल के दस प्रयोगः-
1- काले वस्त्र में लपेट कर अनाज में रख दो तो अनाज में वृद्धि हो।
2- काले वस्त्र में लपेट कर तिजोरी में रख दो तो धन में वृद्धि हो।
3- अंगूठी या छल्ला बनाकर धारण करे तो शनि के दुष्प्रभाव से मुक्ति मिले।
4- द्वार पर सीधा लगाये तो दैवीय कृपा मिले।
5- द्वार पर उल्टा लगाओ तो भूत, प्रेत, या किसी भी तंत्र मंत्र से बचाव हो।
6- शनि के प्रकोप से बचाव हेतु काले घोड़े की नाल से बना छल्ला सीधे हाथ में धारण करें।
7- काले घोड़े की नाल से चार कील बनवाये और शनि पीड़ित व्यक्ति के बिस्तर में चारो पायो में लगा दें।
8- काले घोड़े की नाल से चार कील बनवाये और शनि पीड़ित व्यक्ति के घर के चारो कोने पे लगायें।
9- काले घोड़े की नाल से एक कील बनाकर सवा किलो उरद की दाल में रख कर एक नारियल के साथ जल में प्रवाहित करे।
10- काले घोड़े की नाल से एक कील या छल्ला बनवा ले, शनिवार के दिन पीपल के पेड़ के नीचे एक लोहे की कटोरी में सरसों का तेल भर कर है छल्ला या कील दाल कर अपना मुख देखे और पीपल के पेड़ के नीचे रख दें।आईबीएन-7