Saturday, April 27, 2013

ज्‍योतिष सीखें --,धन प्राप्ति के सामान्य उपाय :सुखी जीवन के लिए वास्तु-अनमोल मंत्र :happy life

 धन प्राप्ति के सामान्य उपाय :  हस्ताक्षर :स् वप्नों का रहस्य व फल :  स्वप्नों का रहस्य व फल :सुखी जीवन के लिए वास्तु-अनमोल मंत्र :वास्तु सिद्धांतों पर करें भवन निर्माण :श्राद्धपक्ष ज्योतिष की नजर में:षष्‍टेश चंद्र पंचम में हो तो लेखन में सफल:जुड़वाँ बच्चे ज्योतिष की नजर में  :वृषभ लग्न में चतुर्थ मंगल से दांपत्य सुख :मुहूर्त सुख समृद्धि का द्वार :मीन लग्न में मंगल:आपके इष्ट देव: टैरो कार्ड की रहस्यमयी दुनिया से  :तर्जनी का व्यावहारिक महत्व:नाम परिवर्तन और भाग्य :विवाह के कुछ शास्त्रीय नियम :  अचूक टोटके आजमाएं और पाएं सफलता:
Easy Methods of Get Money - धन प्राप्ति के सामान्य उपाय 

   आज के युग में सबसे महत्वपूर्ण धन प्राप्ति का कार्य है। कई लोग ऐसे हैं कि किन्हीं अज्ञात कारणों से उनके धन प्राप्ति में कोई रोड़ा अटकाते हैं। इन उपायों (नियमित) से आप अपने घर में लक्ष्मी का स्थायी वास कर सकते हैं-  
(1) जिस घर में नियमित रूप से अथवा हर शुक्रवार को श्रीसुक्त अथवा लक्ष्मीसुक्त का पाठ होता है वहाँ स्थायी लक्ष्मी का वास होता है।   
(2) सप्ताह में एक बार समुद्री नमक से पोछा लगाने से घर में शांति रहती है। घर की सारी नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होकर घर में झगड़े भी नहीं होते हैं तथा लक्ष्मी का वास स्थायी रहता है।   
(3) प्रत्येक अमावस्या को घर की सफाई की जाए। फालतू सामान बेच दें तथा घर के मंदिर में पाँच अगरबत्ती लगाएँ।          (4) प्रत्येक पूर्णिमा को कंडे के उपले को जलाकर किसी मंत्र से 108 बार आहुति से धार्मिक भावना उत्पन्न होती है।   (5) कंडे के उपले को जलाकर लोभान को रखकर माह में दो बार धुएँ को पूरे घर में घुमाएँ।   
(6) यदि आप गुरुवार को पीपल में सादा जल चढ़ाकर घी का दीपक जलाएँ तथा शनिवार को गुड़ तथा दूध मिश्रित जल पीपल को चढ़ाकर सरसों के तेल का दीपक जलाएँ तो आप कभी भी आर्थिक रूप से परेशान नहीं होंगे।   (इन उपायों में से किसी एक, दो या तीन उपाय को नियमित करके देखें आप आर्थिक स्थायी संपन्नता पा सकेंगे।  
 Signatures - हस्ताक्षर :

 जीवन का चरित्र दर्पण    हस्ताक्षर हमारे व्यवहार और समग्र जीवन का चरित्र दर्पण है। व्यक्ति के हस्ताक्षर को देखकर जीवन के प्रति उसकी सोच और दूसरों के प्रति उसके व्यवहार का अनुमान लगाया जा सकता है। इस विज्ञान के सिद्धांत को समझने के लिए हस्ताक्षर के मूल को समझना होगा।   यह सामान्य सी बात है कि आपके हस्ताक्षर आपकी उपस्थिति को प्रकट करते हैं। हस्ताक्षर का महत्व निर्विवाद है। व्यक्ति के हस्ताक्षर ही उसके पूर्ण विश्वास और चरित्र को प्रकट करते हैं। इससे व्यक्ति की मूल सोच और तत्व हस्ताक्षर में ही निहित हो जाते हैं।   हस्ताक्षर व्यक्ति की मनःस्थिति को प्रकट करता है, अतः जब कोई अपने हस्ताक्षर करते वक्त न तो हिचकिचाए और न ही अन्य कुछ सोचे तब उसे ही दृढ़ हस्ताक्षर माना जाता है जो कि अध्ययन की दृष्टि से उचित होता है।   वे लोग जो हस्ताक्षर को संतुलित रखते हों, यानी सभी अक्षर एक ही आकार के रखते हों चाहे उन्होंने अपने हस्ताक्षरों का संक्षिप्तीकरण ही क्यों न कर दिया हो प्रायः अत्यंत व्यवहारकुशल होते हैं। ये अपने कार्यों पर दृढ़ रहते हैं। ऐसे व्यक्ति जो भी निर्णय लेते हैं, वह स्वतंत्र होता है।   उत्तरोत्तर उस पर कायम रहने की असीम इच्छाशक्ति भी इनमें पाई जाती है। इनका व्यक्तित्व प्रबल और आकर्षक होता है। बरबस ही लोग इनके विचारों से प्रभावित होते हैं।  किसी भी हस्ताक्षर के संबंध में यह आवश्यक है कि हस्ताक्षर बिना रुके होना चाहिए। अर्थात हस्ताक्षर पूर्ण गति में बिना कलम रोके हों, ऐसा हस्ताक्षर सबसे अच्छा हस्ताक्षर माना जाता है। लेकिन यह हस्ताक्षर तभी संभव है, जब हस्ताक्षर मात्र किसी चिह्न के रूप में हो या फिर किसी ऐसी भाषा में जिसमें मात्राएँ भी अक्षर रूप में हों।   भारतीय भाषाओं में बिखरे अक्षरों से निर्मित हस्ताक्षर अच्छे समझे जाते हैं। ऐसे हस्ताक्षरों से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि व्यक्ति शालीन व उच्च महत्वाकांक्षी है। यदि ऐसे हस्ताक्षरों से नाम भी स्पष्ट हो तो कहा जा सकता है, कि ऐसे हस्ताक्षर करने वाले व्यक्ति एकनिष्ठ व समयागामी होते हैं तथा अपने लाभ के प्रति पूर्णतः सचेत रहते हैं।   भारत में ऐसे हस्ताक्षर अधिकांशतः राजनेताओं के होते हैं। यदि हस्ताक्षर स्वतः ही पूर्णतः नाम स्पष्ट करते हों, सभी अक्षर एक-दूसरे से जुड़े हों तो व्यक्ति दबंग किस्म का तथा बेहद चालाक होता है। ऐसा व्यक्ति किसीभी समय कुछ भी कर सकता है। 
   Dreams - स्वप्नों का रहस्य व फल 



   यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिक हिप्पोक्रेटस का मानना था कि निद्रा के समय आत्मा शरीर से अलग होकर विचरण करती है और ऐसे में जो देखती है या सुनती है, वही स्वप्न है। अरस्तू ने अपनी पुस्तक 'पशुओं के इतिहास' में लिखा है कि केवल मनुष्य ही नहीं, अपितु भेड़, बकरियाँ, गाय, कुत्ते, घोड़े इत्यादि पशु भी स्वप्न देखते हैं।   प्राचीन भारतीय दार्शनिकों के अनुसार, आत्मा चौरासी लाख योनियों में जन्म लेने और भ्रमण करने के बाद मनुष्य योनि प्राप्त करती है। स्वप्न के माध्यम से वह विभिन्न योनियों में अर्जित अनुभवों का पुनः स्मरण करती है।  स्वप्नों के प्रकार 
* दृष्ट- जो जाग्रत अवस्था में देखा गया हो उसे स्वप्न में देखना।  
* श्रुत- सोने से पूर्व सुनी गई बातों को स्वप्न में देखना।  
* अनुभूत- जो जागते हुए अनुभव किया हो उसे देखना।  
* प्रार्थित- जाग्रत अवस्था में की गई प्रार्थना की इच्छा को स्वप्न में देखना। 
* दोषजन्य- वात, पित्त आदि दूषित होने से स्वप्न देखना।  
* भाविक- जो भविष्य में घटित होना है, उसे देखना। उपर्युक्त सपनों में केवल भाविक ही विचारणीय होते हैं।   स्वप्न फल  प्रकृति अपने ढंग से भावी शुभाशुभ संकेत देती है। स्वप्न भी इसका माध्यम होते हैं। स्वप्नों के फलों की विवेचना के संदर्भ में भारतीय ग्रंथों में इनके देखे जाने के समय, तिथि व अवस्था के आधार पर इनके परिणामों का सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है। इनके अनुसार-   
 शुक्ल पक्ष की षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी और दशमी तथा कृष्ण पक्ष की सप्तमी तथा चतुर्दशी तिथि को देखा गया स्वप्न शीघ्र फल देने वाला होता है।  
 * पूर्णिमा को देखे गए स्वप्न का फल अवश्य प्राप्त होता है।   
* शुक्ल पक्ष की द्वितीया, तृतीया व कृष्ण पक्ष की अष्टमी, नवमी को देखा गया स्वप्न विपरीत फल प्रदान करता है।   
* शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा, कृष्ण पक्ष की द्वितीया के स्वप्न का देरी से फल प्राप्त होता है।   
* शुक्ल पक्ष की चतुर्थी व पंचमी को देखे गए स्वप्न का फल दो माह से दो वर्ष के अंदर प्राप्त होता है।   
* रात्रि के प्रथम, द्वितीय, तृतीय व चतुर्थ प्रहर के स्वप्नों का फल क्रमशः एक वर्ष, आठ माह, तीन माह व छः दिन में मिलता है।   
* उषाकाल में देखे गए स्वप्न का फल दस दिन में मिलता है।   
* सूर्योदय से पूर्व देखे जाने वाल स्वप्न का फल अतिशीघ्र प्राप्त होता है।    Mithun Lagna - मिथुन लग्न बनाता है सफल व्यापारी यदि:

  मिथुन लग्न बुध प्रधान लग्न है। इसमें दो केंद्रों का स्वामी बुध व दो केंद्रों का स्वामी गुरु होता है। चारों केंद्रों पर बुध-गुरु का अधिकार है। इन दो ग्रहों के साथ-साथ सूर्य तृतीयेश पराक्रम, मित्र, भाई भाव का स्वामी भी होता है तो मंगल षष्ठ शत्रु, कर्ज, मामा, रोग भाव का स्वामी होकर आयेश भी होता है।   इस लग्न में गुरु-मंगल-सूर्य की युति काफी महत्वपूर्ण रहेगी। तीन ग्रहों की युति लग्न में हो तो ऐसा जातक साहसी, पराक्रमी, आयु उत्तम होकर पत्नी से लाभ पाने वाला होता है।  यह स्थिति मांगलिक होते हुए भी मांगलिक नहीं होगी क्योंकि सप्तमेश गुरु की राशि धनु पर तीनों ग्रहों में से दो की मित्र दृष्टि और एक की स्वदृष्टि पड़ेगी। अत: ऐसे जातक का जीवनसाथी महत्वाकांक्षी, साहसी, सद्‍गुणों से युक्त होगा। तृतीय भाव में तीन ग्रहों की युति काफी सशक्त मानी जाएगी। ऐसा जातक बड़ा पराक्रमी, श‍त्रुहंता, भाइयों, मित्रों से सहयोग पाने वाला होता है। स्वप्रयत्नों से राज्य व पिता से लाभ पाने वाला होगा।  चतुर्थ भाव में तीनों ग्रहों की युति भी मांगलिक रहेगी। फिर भी मांगलिक न होगा। ऐसे जातक पिता, व्यापार, प्रशासनिक क्षेत्र से सहयोग पाने वाला होता है। माता का स्वास्थ्य मिला-जुला ठीक रहेगा। तृतीयेश और आयेश चतुर्थ में हो तो ऐसा जातक अपने पराक्रम से जनता के कार्यों, जमीन-मकान के कार्य से लाभ पाने वाला होता है।     तीन ग्रहों की युति षष्ठ भाव में हो तो कुछ ‍कठिनाइयों के बाद राज्य, व्यापार, नौकरी, पिता से लाभ मिलता है। शत्रु नहीं होते और मामा से भी लाभ मिलता है। दाम्पत्य जीवन में थोड़ी बाधा रहती है। आय के क्षेत्र में कभी-कभी कमी महसूस करते हैं। लेकिन अपने उद्देश्य में सफल भी होते हैं। यहाँ पर तीन ग्रह षष्ठ भाव में आने से संघर्ष अवश्य रहता है। सप्तम भाव में तीन ग्रहों की युति दाम्पत्य जीवन में ठीक रहती है और अपने जीवनसाथी का भरपूर सहयोग मिलता रहता है।  ऐसे जातक का जीवनसाथी सर्विस में भी हो सकता है। आय भी अच्छी रहती है। मान-प्रतिष्ठा भी मिलती है। मंगल होते हुए भी मांगलिक का प्रभाव नहीं रहेगा। दशम भाव में तीन ग्रहों की युति सर्वश्रेष्ठ परिणाम देने वाली होती होगी।   आयेश कर्म में वही पराक्रमेश भी कर्म में कर्मेश भी कर्म में होने से ऐसा जातक अपने जीवन में ऊँचा उठता है। लेकिन पिता से अलग होकर सफल नहीं हो सकता। पिता का साया जब तक रहेगा, जीवन में उन्नति करता रहेगा।   स्त्री की कुंडली में हो तो सास-ससुर से अच्छा व्यवहार रखें। आयेश एकादश भाव में भी इन तीन ग्रहों की युति अच्छा परिणाम देगी। आय उत्तम होगी वहीं मित्रों, भाइयों, पिता का सहयोग मिलेगा। अन्य भावों में इनकी उपस्थिति ठीक नहीं रहेगी। द्वितीय में हो तो कुटुम्ब से परेशानी, पंचम में हो तो संतान कष्ट, विद्या में बाधा, अष्टम में हो तो स्वास्थ्य में कमी, नवम में हो तो भाग्य में रुकावट, द्वादश में हो तो बाहरी संबंधों में बिगाड़ रहता है। 
 Vastu is the Precious Mantra for Happy Life : सुखी जीवन के लिए वास्तु-अनमोल मंत्र :

  - उत्तर दिशा जल तत्व की प्रतीक है। इसके स्वामी कुबेर हैं। यह दिशा स्त्रियों के लिए अशुभ तथा अनिष्टकारी होती है। इस दिशा में घर की स्त्रियों के लिए रहने की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए।  
- उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र अर्थात्‌ ईशान कोण जल का प्रतीक है। इसके अधिपति यम देवता हैं। भवन का यह भाग ब्राह्मणों, बालकों तथा अतिथियों के लिए शुभ होता है। 
 - पूर्वी दिशा अग्नि तत्व का प्रतीक है। इसके अधिपति इंद्रदेव हैं। यह दिशा पुरुषों के शयन तथा अध्ययन आदि के लिए श्रेष्ठ है।  
- दक्षिणी-पूर्वी दिशा यानी आग्नेय कोण अग्नि तत्व की प्रतीक है। इसका अधिपति अग्नि देव को माना गया है। यह दिशा रसोईघर, व्यायामशाला या ईंधन के संग्रह करने के स्थान के लिए अत्यंत शुभ होती है।  
- दक्षिणी दिशा पृथ्वी का प्रतीक है। इसके अधिपति यमदेव हैं। यह दिशा स्त्रियों के लिए अत्यंत अशुभ तथा अनिष्टकारी होती है।  
- दक्षिणी-पश्चिमी क्षेत्र यानी नैऋत्य कोण पृथ्वी तत्व का प्रतीक है। यह क्षेत्र अनंत देव या मेरूत देव के अधीन होता है। यहाँ शस्त्रागार तथा गोपनीय वस्तुओं के संग्रह के लिए व्यवस्था करनी चाहिए।  
- पश्चिमी दिशा वायु तत्व की प्रतीक है। इसके अधिपति देव वरुण हैं। यह दिशा पुरुषों के लिए बहुत ही अशुभ तथा अनिष्टकारी होती है। इस दिशा में पुरुषों को वास नहीं करना चाहिए। 
 - उत्तरी-पश्चिमी क्षेत्र यानी वायव्य कोण वायु तत्व प्रधान है। इसके अधिपति वायुदेव हैं। यह सर्वेंट हाउस के लिए तथा स्थायी तौर पर निवास करने वालों के लिए उपयुक्त स्थान है।  
- आग्नेय, दक्षिणी-पूर्वी कोण में नालियों की व्यवस्था करने से भू-स्वामी को अनेक कष्टों को झेलना पड़ता है। गृहस्वामी की धन-सम्पत्ति का नाश होता है तथा उसे मृत्युभय बना रहता है।  नै कोण में जल-प्रवाह की नालियां भू-स्वामी पर अशुभ प्रभाव डालती हैं। इस कोण में जल-प्रवाह, नालियों का निर्माण करने से भू-स्वामी पर अनेक विपत्तियाँ आती हैं।  
- दक्षिण दिशा में निकास नालियाँ भूस्वामी के लिए अशुभ तथा अनिष्टकारी होती हैं। गृहस्वामी को निर्धनता, राजभय तथा रोगों आदि समस्याओं से जूझना पड़ता है।  
- उत्तर दिशा में निकास नालियाँ हों तो यह स्थिति भूस्वामी के लिए बहुत ही शुभ तथा राज्य लाभ देने वाली होती है।  - ईशान, उत्तर-पूर्व कोण में जल प्रवाह की नालियाँ भूस्वामी के लिए श्रेष्ठ तथा कल्याणकारी होती हैं। गृहस्वामी को धन-सम्पत्ति की प्राप्ति होती है तथा आरोग्य लाभ होता है।  
- शयनकक्ष में पलंग को दक्षिणी दीवार से लगाकर रखें। सोते समय सिरहाना उत्तर में या पूर्व में कदापि न रखें। सिरहाना उत्तर में या पूर्व में होने पर गृहस्वामी को शांति तथा समृद्धि की प्राप्ति नहीं होती है।   वास्तुशास्त्र घर को व्यवस्थित रखने की कला का नाम है। इसके सिद्धांत, नियम और फार्मूले किसी मंत्र से कम शक्तिशाली नहीं हैं। आप वास्तु के अनमोल मंत्र अपनाइए और सदा सुखी रहिए।   
Architectural principles to building - वास्तु सिद्धांतों पर करें भवन निर्माण :  

 वास्तु शास्त्र का प्रादुर्भाव वस्तुतः जन कल्याण के लिए ही भूमि पर हुआ है। भवन चाहें आवासीय अथवा औद्योगिक ही क्यों न हो, उसका निर्माण वास्तु शास्त्र के सिद्धांतों के आधार पर ही करना चाहिए। यह इसलिए भी आवश्यक है कि वास्तु शास्त्र में निर्दिष्ट सूत्र व भवन-निर्माण की विधियों का उल्लेख इस विषय के पूर्वाचार्यों ने किया है, जो अत्यधिक मनन-चिंतन, खोज-परख व गहन अनुभव के आधार पर प्रतिपादित किए गए हैं।  अतः जब भी आपका इरादा भवन निर्माण का हो, तो यह शुभ कार्य करने से पहले वास्तु शास्त्र के अनुसार, उसके सभी पहलुओं पर विचार करना उत्तम होता है। जैसे शिलान्यास के लिए मुहूर्त्त काल, स्थिति, लग्न, कोण आदि। उसके बाद मकान में निर्मित किए जाने वाले कक्षों की माप, आंगन, रसोई घर, बैडरूम, कॉमन रूम, गुसलखाना, बॉलकनी आदि की स्थिति पर वास्तु के अनुरूप विचार करके ही भवन निर्माण करना चाहिए।   वास्तु शास्त्र के अनुसार भवन में सबसे पहले दीवारों की ओर ध्यान देना चाहिए। दीवारें सीधी और एक आकृति वाली होनी चाहिए। कहीं से मोटी और कहीं से पतली दीवार होने पर अशुभ हो सकता है और गृह स्वामी अथवा गृह स्वामी का परिवार कष्ट में रह सकता है।   मिट्टी की दीवार अन्दर से तथा पत्थर एवं ईंट की दीवार बाहर की ओर से अन्दर लगानी चाहिए। कक्षों के निर्माण में हमेशा इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि वे दक्षिण व पश्चिम दिशा में भारी सामान रखे जाएँ तथा कक्षों के निर्माण के पश्चात्‌ भी उनमें रखे जाने वाला सामान प्रायः दक्षिण पश्चिम में विशेष रूप से रखा जाए। 
   Pitra Yagya = पितृयज्ञ यानी श्राद्धपक्ष ज्योतिष की नजर में:



   शास्त्रों में पितृ को देवतुल्य स्शान दिया गया है। प्रत्येक बड़े धार्मिक अनुष्ठान में पितृपूजन प्रायश्चित नांदी श्राद्ध पहले किया जाता है। उसके बाद ही आगे का कर्म होता है। पितृपक्ष 16 दिवसीय होता है। यह भाद्रपद की पूर्णिमा से आश्विन (क्वार) कृष्ण पक्ष अमावस्या तक रहता है। ऐसी शास्त्रोंक्त धारणा है कि इन सोलह दिनों में पितृ अपने परिवार के बीच रहते हैं एवं उस परिवार द्वारा दिया गया भोग ग्रहण करते हैं और उसे आशीर्वाद प्रदान करते हैं।  त्रेतायुग में भी भगवान श्रीराम द्वारा पितृपूजन का प्रमाण मिलता है। माता सीता और भगवान श्रीराम द्वारा गयाजी श्राद्ध पिता दशरथ के लिए किया गया था। इसका प्रमाण आज भी शिला यानी दशरथ‍शिला के नाम से गयाजी में विद्यमान है।  प्रत्येक व्यक्ति को पितृपूजन करना चाहिए। जिस परिवार को पितृदोष होता है उसके लिए इस पक्ष में किया गया नारायण बलि पूजन बहुत महत्वपूर्ण होता है। पितृपूजन में दिवंगत पिता, पितामह, प्रपितामह, माता, मातामह, प्रमातामह, मातामह (नाना), प्रमातामह, वृद्धमातामह, मातामही (नानी) एवं इससे जुड़े पूरे परिवार से संबंधित दिवंगत कोई भी सदस्य यथा बहन, काका, मामा, बुआ, मौसी, ससुर आदि का भी महत्व रहता है। इनके पूजन के अलावा दिवंगत गुरु तथा सखा तक के पूजन का पूजन विधान है।  मनोकामना भी पूर्ण होती है : पितृदोष वाला परिवार 15 दिन पितरों का निम्न मंत्र से पितृ आवाहन करके यर्जुवेद के नौ मंत्रों को प्रतिदिन पढ़े तो उसके प्रत्येक कार्य बिना विघ्न के संपन्न होंगे तथा मनोकामना पूर्ण होगी।        ॐ उशन्तस्त्वा निधीमह्त्रुशन्त: समिधीमहि। उशन्नुशत आ वह पितृन हविषे अन्तवे।। या यन्तु न: पितर: सोम्यासोऽग्निएवाता: पथिभिदैवयाने:। अस्मिन् यज्ञे स्वधया मदन्तोऽधि ब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान्।।  आवाहन के बाद पितृतीर्थ से जल गिराएँ या ब्राह्मण द्वारा पाठ कराएँ पितृ अवश्य प्रसन्न होंगे। 
  Sixth Moon in Fifth - षष्‍टेश चंद्र पंचम में हो तो लेखन में सफल:

    चंद्र षष्‍टेश कुंभ लग्‍न में होगा और यदि षष्‍टेश पंचम लग्‍न में हो तो उस जातक की मिथुन राशि होगी, जो द्विस्‍वभाव होगी। ऐसा जातक विद्या में बाधाओं के बाद सफलता प्राप्‍त करेगा। चूँकि बुध की मिथुन राशि में होने से बुध अष्‍टमेश भी होगा। चंद्र के साथ बुध की युति हो तो ऐसा जातक लेखन, प्रकाशन के कार्यों से सफलता के साथ धनार्जन करता है। यह पत्रकार भी हो सकता है।   चंद्र-सूर्य साथ हों तो संतान, विद्या में कष्‍ट रहे। पत्‍नी या पति से न बने। गुरु साथ होने पर आय अच्‍छी रहे। धन-कुटुम्ब का लाभ मिले। ज्‍योतिष में भी रुचि रखने वाला हो। मंगल साथ रहने पर बाहरी संबंध ठीक रहें। आय स्‍वप्रयत्‍नों से आए। भाइयों और मित्रों का सहयोग मिले। शुक्र साथ होने पर ऐसे जातक के संबंध अधिक होते हैं। ऐसा जातक भोगी भी होता है।   शनि साथ हो तो विद्या में परिश्रम द्वारा सफल रहेगा। राहु साथ होने पर विद्या उत्‍तम हो और अंग्रेजी का ज्ञान अच्‍छा हो। केतु साथ होने पर एक संतान को कष्‍ट करे, विद्या कम हो। षष्‍टेश चंद्र यदि षष्‍ट भाव में हो तो कर्क राशि होगी। ऐसे जातक मिली-जुली कद-काठी और औसत रंग-रूप का होगा। उसे मामा, नाना से लाभ होगा। सूर्य साथ हो तो ऐसे जातक का दांपत्‍य बिगड़ जाता है। शत्रु से परेशान और कर्जदार भी होता है।          मंगल साथ हो तो सर्विस में बाधा, पिता को कष्‍ट होता है। गुरु साथ हो तो शत्रु न के बराबर हो। नाना, मामा से लाभ, कर्ज न हो, राज्‍य और पिता से लाभ रहे। शुक्र साथ रहने पर माता को कष्ट रहे और भाग्‍योन्‍नति में बाधा दे। बाहरी संबंध अच्‍छे हों और जातक भोगी हो।   शनि साथ होने पर परिश्रम से लाभ, शत्रु नहीं होना, नाना, मामा की उम्र अधिक होना। राहु साथ होने पर मामा को कष्‍ट रहे। केतु साथ रहने पर अकस्‍मात दुर्घटना हो, चोट लगे। चंद्र यदि सप्‍तम में हो तो सिंह राशि होगी। ऐसे जातक उत्तम कद-काठी के होते हैं। चंद्र-सूर्य साथ हों तो दांपत्‍य जीवन थोड़ा कष्टकारी हो, जीवनसाथी को रोग हो सकता है। मंगल साथ हो तो उसका जीवनसाथी तेज और उग्र स्‍वभाव का होगा।   बुध साथ हो तो विद्या उत्तम हो। पति या पत्‍नी पढ़ी-लिखी और समझदार हो। गुरु साथ होने पर धर्म-कर्म को जानने वाली पतिव्रता हो। शुक्र साथ हो तो सुंदर लेखन और भोगी हो या भाग्‍योन्‍नति में बाधा रहे। शनि साथ हो तो दांपत्‍य जीवन कष्‍टप्रद करे। राहु साथ हो तो केतु इस भाव में ठीक नहीं रहता है।   षष्‍टेश चंद्र अष्‍टम में हो तो कन्‍या राशि होगी, ऐसे जातक को एक बार रोग लग जाए तो जल्‍द ठीक नहीं होता है। विद्या में कष्‍ट और संतान में बाधा होती है। सूर्य साथ हो तो त्‍वचा जलन करे और चर्म रोग हो। मंगल साथ हो तो दांपत्‍य में कष्‍ट करे। आयु उत्तम हो। गुरु साथ हो तो आय में कमी, बचत में कमी हो। शुक्र साथ हो तो भोगी हो। गुप्‍त रोग हो सकते हैं। भाग्‍योन्नति में बाधा रहे। शनि साथ हो तो आयु उत्तम हो। राहु साथ रहे तो अर्श की बीमारी हो। केतु साथ होने पर चोट लगे या ऑपरेशन की स्‍थिति आ सकती है।   
Twins: In Astrology - जुड़वाँ बच्चे ज्योतिष की नजर में   :



    जुड़वाँ बच्चे बड़े मोहक लगते हैं। लेकिन कुंडली के कौन से ग्रह यह तय करते हैं कि बच्चे जुड़वाँ होंगे। ज्योतिषाचार्यों का मानना है कि अगर गर्भाधान के समय निम्नलिखित ग्रह स्थितियाँ हो तो जुड़वाँ बच्चों की संभावना बनती है।   
1. चंद्रमा एवं शुक्र सम राशि में स्थित हो।   
2. बुध, मंगल एवं गुरु ‍विषम राशि में हो।   
3. लग्न एवं चंद्रमा समराशि में स्थित हो और पुरुष ग्रह द्वारा देखे जाते हो। 
 4. बुध, मंगल, गुरु और लग्न बलवान हो तथा समराशि में स्थित हो।   
5. मिथुन या धनुराशि में गुरु-सूर्य हो एवं बुध से दृष्‍ट हो तो दो पुत्र होते हैं।   
6. शुक्र, चंद्र, मंगल, कन्या या मीन राशि में बुध से दृष्ट हो तो दो पुत्रियाँ होती हैं। 
    Vrashabh Lagna - वृषभ लग्न में चतुर्थ मंगल से दांपत्य सुख :



   वृषभ लग्न में मंगल सप्तमेश व द्वादशेश होगा। मंगल इस लग्न वालों के लिए सप्तमेश होने से मारकेश भी है। वहीं द्वाददेश व्यय का स्थान है।   मंगल लग्न में हो तो ऐसे जातक मांगलिक होते हुए भी मांगलिक प्रभाव से मुक्त होंगे क्योंकि मंगल की सप्तम दृष्टि स्वदृष्टि पड़ेगी। ऐसे जातक का जीवनसाथी पराक्रमी व साहसी होगा, गुस्सैला भी हो सकता है। मंगल के साथ चंद्र होने से ऐसे जातक ऊर्जावान, स्फूर्तिवान होते हैं। सूर्य साथ हो तो माता से लाभ होता है। जनता से संबंधित मामलों में सावधानी बरतकर चलें तो उत्तम सफलता मिलती है। बुध साथ हो तो संतान, विद्या लाभ और लव मैरेज के योग बनते हैं।  गुरु साथ हो तो दाम्पत्य जीवन सुखी रहता है। आय स्वप्रयत्नों से होती है। भाग्योन्नति में रुकावट आती है। शुक्र साथ होने पर सुंदर होता है व ऐसा जातक योगी भी होता है। अपने जीवनसाथी को चाहने वाला होता है। शनि साथ हो तो भाग्योन्नति में बाधा, व्यापार, नौकरी में बाधा, स्वास्थ्‍य में गड़बड़ी, प्रयत्नपूर्वक भी सफलता नहीं मिलती।         राहु साथ होने पर ऐसा जातक व्यसनी होता है। केतु साथ हो तो जिद्दी स्वभाव हो, शरीर में चोट लगे। मंगल द्वितीयस्थ हो तो ऐसा जातक वाणी का सख्त होता है। जीवनसाथी से लाभ पाने वाला होता है। चंद्र साथ होने पर पराक्रम से सफलता मिलती है। धन की बचत कम होती है। सूर्य साथ हो तो पारिवारिक, माता, जनता से संबंधों में लाभ होता है।     बुध साथ हो तो धन की बचत होती है, विद्या-संतान उत्तम होती है। गुरु साथ होने पर आयु उत्तम हो, धन का लाभ रहे। वाणी मधुर होती है। शुक्र साथ होने पर ऐसे जातक सेक्सी भी होते हैं। अनेक संबंध भी हो सकते हैं। शनि साथ हो तो जीवनसाथी को खतरा, कुटुंबियों से न बने, धन की भी बचत न हो। राहु साथ हो तो गुप्त युतियों से लाभ मिले।   केतु साथ हो तो सीधी आँख में चोट लगे या ज्योति कमजोर हो। मंगल तृतीय भावस्थ हो तो नीच का होने से भाइयों, मित्रों से नहीं बनती, साझेदारी के कार्य में सफलता नहीं मिल पाती व पड़ोसियों से भी नहीं बनती। भाग्य जरूर साथ देता रहता है। मंगल के साथ चंद्र हो तो मंगल का नीच भंग होने से अशुभ फल नहीं मिलते। भाई, मित्र आदि सहयोग देते हैं। सूर्य साथ हो तो माता का स्वास्थ्‍य गड़बड़ रहता है।  पारिवारिक मामलों में कुछ कमी के साथ सफलता मिलती है। बुध साथ होने पर धन, विद्या का लाभ प्रयत्नपूर्वक मिलता है। गुरु साथ हो तो ईमानदारी से आर्थिक लाभ मिलता है। पराक्रम अधिक करना पड़ता है। शुक्र साथ होने पर लेखन कार्य से सफलता मिलती है, बहु पत्नी योग भी बनता है। शनि साथ हो तो बाधा आती है। राहु साथ हो तो श‍त्रु नहीं होते। केतु साथ होने पर भाइयों को क्षति पहुँचती है। मंगल चतुर्थ में हो तो मांगलिक होते हुए भी मंगल का प्रभाव नहीं रहता। दाम्पत्य सुख अच्छा रहता है। मकान-भूमि का लाभ मिलता है।   सूर्य साथ हो तो सभी सुख मिलते हैं। चंद्र साथ हो तो पराक्रम से लाभ मिलता है। बुध साथ हो तो विद्या में कुछ कमी रहती है लेकिन संतान सुख अच्छा रहता है। शुक्र साथ हो तो जातक सुंदर होता है। गमन में सफलता मिलती है। शनि साथ होने पर माता नहीं रहती या हो तो बीमार अधिक रहे। राहु साथ होने पर पारिवारिक परेशानियाँ रहे। केतु साथ हो तो माँ-बेटे अलग-अलग रहें या आपस में नहीं बनती।   
 Auspicious Time Way to Prosperity - मुहूर्त सुख समृद्धि का द्वार :



   कहते हैं किसी भी वस्तु या कार्य को प्रारंभ करने में मुहूर्त देखा जाता है, जिससे मन को बड़ा सुकून मिलता है। यहाँ हम कोई भी बंगला या भवन निर्मित करें या कोई व्यवसाय करने हेतु कोई सुंदर और भव्य इमारत बनाएँ तो सर्वप्रथम हमें 'मुहूर्त' को प्राथमिकता देनी होगी।   शुभ तिथि, वार, माह व नक्षत्रों में कोई इमारत बनाना प्रारंभ करने से न केवल किसी भी परिवार को आर्थिक, सामाजिक, मानसिक व शारीरिक फायदे मिलते हैं वरन उस परिवार के सदस्यों में सुख-शांति व स्वस्थता की प्राप्ति भी होती है।   यहाँ शुभ वार, शुभ महीना, शुभ तिथि, शुभ नक्षत्र भवन निर्मित करते समय इस प्रकार से देखे जाने चाहिए ताकि निर्विघ्न, कोई भी कार्य संपादित हो सके।   शुभ वार : सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार (गुरुवार), शुक्रवार तथा शनिचर (शनिवार) सर्वाधिक शुभ दिन माने गए हैं। मंगलवार एवं रविवार को कभी भी भूमिपूजन, गृह निर्माण की शुरुआत, शिलान्यास या गृह प्रवेश नहीं करना चाहिए।          शुभ माह : देशी या भारतीय पद्धति के अनुसार फाल्गुन, वैशाख एवं श्रावण महीना गृह निर्माण हेतु भूमिपूजन तथा शिलान्यास के लिए सर्वश्रेष्ठ महीने हैं, जबकि माघ, ज्येष्ठ, भाद्रपद एवं मार्गशीर्ष महीने मध्यम श्रेणी के हैं।   यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि चैत्र, आषाढ़, आश्विन तथा कार्तिक मास में उपरोक्त शुभ कार्य की शुरुआत कदापि न करें। इन महीनों में गृह निर्माण प्रारंभ करने से धन, पशु एवं परिवार के सदस्यों की आयु पर असर गिरता है।  शुभ तिथि : गृह निर्माण हेतु सर्वाधिक शुभ तिथियाँ ये हैं : द्वितीया, तृतीया, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी एवं त्रयोदशी तिथियाँ, ये तिथियाँ सबसे ज्यादा प्रशस्त तथा प्रचलित बताई गई हैं,जबकि अष्टमी तिथि मध्यम मानी गई है।   प्रत्येक महीने में तीनों रिक्ता अशुभ होती हैं। ये रिक्ता तिथियाँ निम्न हैं- चतुर्थी, नवमी एवं चौदस या चतुर्दशी। यहाँ रिक्ता से आशय रिक्त से है, जिसे बोलचाल की भाषा में खालीपन या सूनापन लिए हुए रिक्त (खाली) तिथियाँ कहते हैं। अतः इन उक्त तीनों तिथियों में गृह निर्माणनिषेध है।   शुभ नक्षत्र : किसी भी शुभ महीने के रोहिणी, पुष्य, अश्लेषा, मघा, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तरा भाद्रपदा, स्वाति, हस्तचित्रा, रेवती, शतभिषा, धनिष्ठा सर्वाधिक उत्तम एवं पवित्र नक्षत्र हैं। गृह निर्माण या कोई भी शुभ कार्य इन नक्षत्रों में करना हितकर है। बाकी सभी नक्षत्र सामान्य नक्षत्रों की श्रेणी में आ जाते हैं।   सप्त साकार का विस्मयकारी योग :  शास्त्रानुसार (स) अथवा (श) वर्ण से शुरू होने वाले सात शुभ लक्षणों में गृहारंभ निर्मित करने से धन-धान्य व अपूर्व सुख-वैभव की निरंतर वृद्धि होती है व पारिवारिक सदस्यों का बौद्धिक, मानसिक व सामाजिक विकास होता है। सप्त साकार का यह योग है, स्वाति नक्षत्र, शनिवार का दिन, शुक्ल पक्ष, सप्तमी तिथि, शुभ योग, सिंह लग्न एवं श्रावण माह। अतः गृह निर्माण या कोई भी कार्य के शुभारंभ में मुहूर्त पर विचार कर उसे क्रियान्वित करना अत्यावश्यक है।   
 Meen Lagna - मीन लग्न में मंगल की उच्च स्थिति महाधनी बनाए :

   मीन लग्न अंतिम लग्न होकर गुरु प्रधान होने के साथ-साथ जल तत्व प्रधान लग्न है। इस लग्न में दो केंद्रों का स्वामी गुरु होगा जो दशमेश भी है। गुरु की महादशा 16 वर्ष की होती है व इसका रत्न सुनहरी पुखराज होता है।  गुरु लग्न में हो तो सौम्य होगा ऐसा जातक सुंदर, सुशील, ज्ञानवान पंडित, शास्त्रों का ज्ञाता, ज्योतिषी, गणितज्ञ, ईमानदार स्वभाव का धनी होता है। ऐसे जातक हृष्ट-पुष्ट व गोल चेहरे वाले होते हैं। मान-प्रतिष्ठा उत्तम बनी रहती है। विद्या के क्षेत्र में अच्छी सफलता पाने वाले होते हैं। भाग्य भी इनका साथ देता है। पिता, राज्य, व्यापार, राजनीति में भी सफल होते हैं। ऐसे जातक प्रोफेसर, लेखक, बैंककर्मी अधिक पाए जाते हैं।   इनमें पृथक्करण की अच्छी क्षमता होती है। गुरु के साथ मंगल का हो मिलन तो ऐसा जातक दृढ़ निश्चय वाला, साहसी, भाग्यशाली, धन-कुटुंब से युक्त होता है। ऐसे जातक की वाणी प्रभावशाली होती है। ऐसा जातक मांगलिक होते हुए भी मांगलिक नहीं माना जाता क्योंकि मंगल के साथ गुरु की युति या दृष्टि संबंध या गुरु के केंद्र में होने से मंगल दोष नहीं लगता। यदि मंगल, गुरु, शनि साथ हों या दृष्टि संबंध रखते हों तो मंगल दोष पूर्णरूपेण लगता है। अत: इस दोष के जानकार से सलाह लेकर ही विवाह हेतु आगे बढ़ें।        गुरु के साथ चंद्र लग्न में हो तो ऐसा जातक नीति कुशल, विद्वान, सुंदर, गौर वर्ण, नम्र स्वभाव वाला, नृत्य के क्षेत्र में हो तो अच्छी सफलता पाने वाला होता है। ऐसे जातक अच्छे ज्योतिषी, गणित विषय में प्रवीण होते हैं। इनकी संतान भी गुणी होती है। लक्ष्मीनारायण योग होने से धन की कभी कमी नहीं रहती। किसी जातक को गुरु-चंद्र-मंगल साथ हों तो ऐसा जातक अपने नाम को रोशन करने वाला सर्वगुण संपन्न होता है।    गुरु की शुभ स्थिति दशम, नवम, पंचम में होती है। चंद्र पंचमेश होकर पंचम में हो तो ऐसा जातक शांतिप्रिय सौम्य प्रवृत्ति का, मधुरभाषी, कन्या संतति वाला होता है। गुरु की चंद्र पर दृष्टि पड़े तो ऐसा जातक गजकेसरी योग होने से सुखी-संपन्न होता है। ऐसे जातक का चरित्र भी उत्तम होता है। ज्ञान-प्रतिष्ठा पाने वाला, धर्म-कर्म को जानने वाला, बड़ों का आदर करने वाला होता है।  मंगल इस लग्न में धनेश व भाग्येश होता है। मंगल वित्तीय धनभाव में हो तो ऐसा जातक भाग्य से धन-कुटुंब का सहयोग पाने वाला होता है। मंगल की उच्चस्थिति एकादश में हो तो ऐसा जातक महाधनवान बनता है। बशर्ते शनि की दृष्टि न हो न ही राहु युति हो। मंगल दशम में होकर गुरु के साथ हो तो ऐसा जातक कुशल प्रशासनिक सेवाओं में सफलता पाने वाला होता है। व्यापारी हो तो उच्च व्यापार में सफलता मिलती है।  पिता का साथ मिलता है। शासकीय मामलों में सफल होता है। गुरु यदि लग्न दशम, नवम में हो तो पुखराज पहनें, अच्छी सफलता मिलेगी। मंगल उच्च का हो तो मूँगा पहन सकते हैं वहीं नवम में भी हो तो मूँगा पहन सकते हैं। चंद्र स्वराशिस्थ हो तो भी पहनें। मीन लग्न वाले हीरा व पन्ना कभी न पहनें।   शुभ रंग- पीला, नारंगी, गुलाबी, लाल, सफेद भाग्यांक- 3, 9, 2 शुभ वार- गुरु, मंगल, सोम शुभ दिशा- पूर्व   
 Rashi Vibhed - राशि विभेद :
   आपने देखा होगा कि कई बार लोग आपसे बिना वजह ही झिक-झिक या शत्रुतापूर्ण व्यवहार करते हैं। ज्योतिष की दृष्टि से यदि इस मुद्दे पर विचार किया जाए, तो इसका कारण राशिगत भेद हो सकता है। व्यक्ति यदि शुरू से ही इन कारणों पर घ्यान देकर बचाव करे, तो शत्रुता की संभावना कम हो सकती है।  मेष: मेष राशि वालों की अनैतिक व्यवहार करने वालों से दोस्ती कम होती है।   वृष: वृष राशि वाले धन संपत्ति के लेन-देन व धार्मिकता के कारण आलोचना के पात्र बन सकते हैं।  मिथुन: मिथुन राशि वालों की चुगलखोर व्यक्ति या महिलाओं के कारण शत्रुता हो सकती है।  कर्क: कर्क राशि वाले दूसरों की गलत बातों, पशुओं व धर्म के कारण शत्रु बना बैठते हैं।  सिंह: सिंह राशि वाले दूसरों की मदद करने के कारण शत्रुता के भागी बनते हैं।  कन्या: कन्या राशि वाले अपनी प्रतिष्ठा व अपने से बड़े व्यक्ति के विरोध के कारण शत्रु बन सकते हैं।  तुला: तुला वालों की संतान, वस्त्र, संपदा, दूसरों की मदद करने व महिलाआं के कारण शत्रुता हो सकती है।  वृश्चिक: वृश्चिक राशि वाले अपने क्रोध के कारण दूसरों को शत्रु बना बैठते हैं।  धनु: धनु राशि वाले प्रेम-प्रसंग, परिजनों व बंधुओं के कारण शत्रु बना बैठते हैं।  मकर: मकर वालों के असामाजिक तत्वों, व्यापारियों, प्रतिद्वंद्वी के कारण शत्रुता हो सकती है।  कुंभ: कुंभ राशि वालों के शत्रु कम होंगे, परंतु गुरूजनों व व्यावसायिक मित्रों के कारण शत्रुता होगी।  मीन: मीन राशि वालों के परिजनों, बंधुओं व धन-संपत्ति के कारण शत्रुता होना संभव है।   
  Your favorite Dev - आपके इष्ट देव:
    शास्त्रों की मान्यतानुसार अपने इष्ट देव की आराधना करने से मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं। आपके आराघ्य इष्ट देव कौन से होंगे इसे आप अपनी जन्म तारीख, जन्मदिन, बोलते नाम की राशि या अपनी जन्म कुंडली की लग्न राशि के अनुसार जान सकते हैं।  जन्म माह : जिन्हें केवल जन्म का माह ज्ञात है, उनके लिए इष्ट देव इस प्रकार होंगे- 
-जिनका जन्म जनवरी या नवंबर माह में हुआ हो वे शिव या गणेश की पूजा करें। 
 -फरवरी में जन्मे शिव की उपासना करें।  
-मार्च व दिसंबर में जन्मे व्यक्ति विष्णु की साधना करें। 
-अप्रेल, सितंबर, अक्टूबर में जन्मे व्यक्ति गणेशजी की पूजा करें।  
-मई व जून माह में जन्मे व्यक्ति मां भगवती की पूजा करें।  
-जुलाई माह में जन्मे व्यक्ति विष्णु व गणेश का घ्यान करें। 
  जन्म वार से : जिनको वार का पता हो, परंतु समय का पता न हो, तो वार के अनुसार इष्ट देव इस प्रकार होंगे
  रविवार- विष्णु।  
सोमवार- शिवजी।  
 मंगलवार- हनुमानजी 
 बुधवार- गणेशजी।   
गुरूवार- शिवजी  
शुक्रवार- देवी।   
शनिवार- भैरवजी। 
 जन्म कुंडली से : जिनको जन्म समय ज्ञात हो उनके लिए जन्म कुंडली के पंचम स्थान से पूर्व जन्म के संचित कर्म, ज्ञान, बुद्धि, शिक्षा, धर्म व इष्ट का बोध होता है। अरूण संहिता के अनुसार व्यक्ति के पूर्व जन्म में किए गए कर्म के आधार पर ग्रह या देवता भाव विशेष में स्थित होकर अपना शुभाशुभ फल देते हैं।  राशि के आधार पर 
 पंचम स्थान में स्थित राशि के आधार पर आपके इष्ट देव इस प्रकार होंगे:
मेष: सूर्य या विष्णुजी की आराधना करें।  
वृष: गणेशजी।  मिथुन: सरस्वती, तारा, लक्ष्मी।  
कर्क: हनुमानजी।  
सिंह: शिवजी।  
कन्या: भैरव, हनुमानजी, काली।  
तुला: भैरव, हनुमानजी, काली।  
वृश्चिक: शिवजी। 
धनु: हनुमानजी। 
 मकर: सरस्वती, तारा, लक्ष्मी। 
 कुंभ: गणेशजी।  
मीन: दुर्गा, राधा, सीता या कोई देवी। 
 ग्रह के आधार पर इष्ट: पंचम स्थान में स्थित ग्रहों या ग्रह की दृष्टि के आधार पर आपके इष्ट देव। 
 सूर्य: विष्णु।   
चंद्रमा- राधा, पार्वती, शिव, दुर्गा।  
 मंगल- हनुमानजी, कार्तिकेय।  
 बुध- गणेश, विष्णु।   
गुरू- शिव।   
शुक्र- लक्ष्मी, तारा, सरस्वती।   
शनि- भैरव, काली।  
   Deep Lines Shows Destiny - गहरी रेखाएँ भाग्य प्रदर्शक:

    पतली भाग्य रेखा वाले व्यक्ति को भाग्य का सहयोग कम मिलता है, लेकिन गहरी और मोटी भाग्य रेखा वाले व्यक्ति जीवन में पुरुषार्थ से अधिक सफलता प्राप्त करते हैं। हृदय रेखा का गहरा होना विचारों में दृढ़ता एवं गंभीरता लाता है, जबकि इसका पतला होना व्यक्ति की भावुक एवं कमजोर मानसिक स्थिति को जन्म देता है।  हस्तरेखा में हाथ की रेखाओं की मोटाई और गहराई से बहुत फर्क पड़ता है। जो रेखा कम गहरी अथवा पतली होती है उस रेखा के अनुसार उसका फल कम मिलता है, जैसे जीवनरेखा में इस प्रकार का लक्षण प्राण शक्ति को कम करता है। इस प्रकार के हाथ वाले व्यक्ति मौसम के परिवर्तन से, वातावरण के परिवर्तन से, कार्यस्थिति के परिवर्तन से बीमार हो जाते हैं। ये अधिक शारीरिक कष्ट या परिश्रम सहन नहीं कर पाते हैं, लेकिन जीवनरेखा गहरी हो तो ऐसे व्यक्ति अपने शरीर की बिलकुल परवाह नहीं करते हैं।   पतली भाग्य रेखा वाले व्यक्ति को भाग्य का सहयोग कम मिलता है, लेकिन गहरी और मोटी भाग्य रेखा वाले व्यक्ति जीवन में पुरुषार्थ से अधिक सफलता प्राप्त करते हैं। हृदय रेखा का गहरा होना विचारों में दृढ़ता एवं गंभीरता लाता है, जबकि इसका पतला होना व्यक्ति की भावुक एवं कमजोर मानसिक स्थिति को जन्म देता है। विवाह रेखा यदि गहरी है तो जातक का दांपत्य जीवन मधुर, दीर्घ एवं संतुष्टिदायक होता है।        इसके विपरीत कम गहरी अथवा उथली विवाह रेखा वाले व्यक्तियों के दांपत्य जीवन में वैचारिक मतभेद अधिक होते हैं तथा वैवाहिक जीवन की सफलता की संभावना कम रहती है। मस्तिष्क रेखा गहरी होने पर व्यक्ति तीष्ण बुद्धि वाला हर कार्य सोच-समझकर करने वाला स्थिर मानसिक स्थिति वाला होता है, जबकि पतली मस्तिष्क रेखा व्यक्ति की मानसिक अस्थिरता, क्रोधी एवं बिना सोच-समझे बोलने और कार्य करने की प्रवृत्ति को इंगित करती है।   पतली या कम गहरी सूर्य रेखा वाले व्यक्तियों के जीवन में सफलता और क्रियाशीलता का ग्राफ कम होता है, कलात्मकता का उसमें अभाव होता है, किंतु यदि सूर्य रेखा गहरी हो तो जातक अपने जीवन में पुरुषार्थ से पर्याप्त सफलता प्राप्त करता है तथा कलात्मकता द्वारा प्रसिद्धि पाने का योग भी उसमें होता है।   बुध रेखा अथवा स्वास्थ्य रेखा का हथेली पर न होना अच्छे स्वास्थ्य का सूचक है, लेकिन इस रेखा का पतला होना मध्यम स्वास्थ्य का द्योतक है। जब यह रेखा गहरी हो जाती है तो ऐसे जातक को चिकित्सा और औषधियों पर अपना अर्थ और समय दोनों बहुत देना पड़ता है। 
 What your handwriting says - क्या कहती है आपकी हस्तलिपि :

   हस्तलेख विश्लेषण कोई नया विज्ञान नहीं है, अपितु प्राचीनकाल से ही शोध का दिलचस्प क्षेत्र रहा है। समय-समय पर गुफाओं के प्राचीन भित्ति चित्र, काष्ठशिल्प, प्रतीकों, चिन्हों का विश्लेषण कर उस समय के मानव की भावनाओं को जानने की कोशिश की है। हस्तलेख के मूल सिद्धांत आज से लगभग 6 हजार वर्षों पूर्व ही ज्ञात कर लिए गए थे।  हस्तलेख पर पहली पुस्तक इटली के मैक्ली बाल्डी द्वारा 1932 में लिखी गई। इस तरह की पुस्तकों के अध्‍ययन से मनोवैज्ञानिक, पुलिस, व्यापारी तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं को अन्य व्यक्तियों के बारे में जानकारी हासिल करने में विशेष सहायता मिली।   हस्तलेखन को मस्तिष्क का लेखन कहा जाता है। क्योंकि अनुभवी हस्तलेख विशेषज्ञ के लिए यह किसी लेखक की अवचेतन अनुभूतियों की अभिव्यक्ति करता है। हर व्यक्ति की हस्तलिपि एक विशिष्टता लिए होती है और एक ही व्यक्ति की हस्तलिपि में परिवर्तन दुर्बलता, जल्दबाजी, उत्तेजना या बीमारी के कारण आ सकता है। किंतु ध्यानपूर्वक देखा जाए तो इन कारणों के साथ ही व्यक्ति का व्यक्तित्व पहचाना जा सकता है।         जहाँ एक चरित्र और व्यक्तित्व के मूल्यांकन और मानसिक तथा शारीरिक स्वास्थ्‍य के संकेतन का प्रश्न है, हस्तलेखन का महत्व सु्स्पष्ट है। हर व्यक्ति की हस्तलिपि में अक्षरों की बनावट, दबाव, गति आदि में भिन्नता पाई जाती है।  कुछ व्यक्ति गोल, बड़े स्पष्ट और कुछ व्यक्ति छोटे, घिचपिच, अस्पष्ट अक्षर लिखते हैं। लिखावट में भी जोर देकर या हल्के हाथों से लिखते हैं। इन बातों का सूक्ष्म विश्लेषण कर व्यक्ति के स्वभाव आदि के बारे में जाना जा सकता है।  जो व्यक्ति सीधा लिखते हैं तो इसका आशय है कि मस्तिष्क का प्रभाव हृदय पर पड़ता है और ऐसे व्यक्ति स्वतंत्र, ठंडे और आत्मविश्वासी होते हैं। आसानी से बहाव में नहीं आते हैं।   वे कल्पनाशील और दूरदृष्टा नहीं होते हैं, परंतु व्यवस्थित और नियमि‍त तथा सुचारु रूप से कार्य करना इनकी आदत में शामिल होता है। सीधी हस्तलिपि वालों में भाव संप्रेषणीयता का अभाव पाया जाता है । ये आत्मकेंद्रित, उच्च योग्यता से सुशोभित महत्वाकांक्षी व्यक्ति होते हैं।   अपनी योग्यता का पूर्णरूपेण उपयोग करने में निपुण होते हैं। अधिकांशतया इस तरह का हस्तलेखन नेता, मैनेजर और करियर को प्रधानता देने वाली महिलाओं में पाया जाता है।  बच्चों में यदि सीधा लेखन पाया जाए तो यह कार्य तत्परता का सूचक है। इस तरह की लिखावट वाले व्यक्ति विद्या की अनेकानेक शाखाओं में रुचि लेते हैं। अंतर्मुखी व्यक्ति की लिखावट में बाईं ओर झुकाव व्यक्ति के शर्मीले और संकोची स्वभाव की ओर इंगित करता है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि यह बचपन की ओर वापसी का प्रमाण है। ऐसे लोग बाह्य जगत से भिन्न होते हैं। स्वयं को पृथक अनुभव करते हैं।  अपने अहं के प्रति जागरूक तथा इन्हें दूसरों के साथ समय बिताना मुश्किल लगता है। प्राय: इस तरह की मन:स्थिति किशोरावस्था में होती है। ऐसा इस अवस्था में जागरूकता और हार्मोनल समस्याओं के कारण होता है। ये अपने ‍परिवार को खूब प्यार करते हैं। काफी सावधानियाँ बरतने के बावजूद धोखा खा जाते हैं। जीवन में ऐसे लोग सुरक्षात्मक दृष्टिकोण अपनाते हैं।   अधिकांशतया इस तरह की लिखावट वाले व्यक्ति कलाकार और कवि होते हैं, जबकि अत्यधिक बाईं ओर झुकाव भावनात्मक जीवन की उथल-पुथल दर्शाता है।  विशेषकर लड़कियों में, परिणामस्वरूप उनमें दैनिक जीवन के प्रति उदासीनता, चिड़चिड़ापन, नकारात्मक व्यवहार, प्रतिरोध की भावना तथा अहं केंद्रीयता पाई जाती है। प्राय: इस तरह के लोग समाज में फिट नहीं बैठते हैं। इनके विचारों में तेजी से परिवर्तन होता रहता है।  लेखन में संयुक्त लिखावट में अक्षर एक-दूसरे से श्रेणीबद्ध तरीके से जुड़े होते हैं। ये निरंतर होने वाली मानसिक प्रक्रियाओं के सूचक होते हैं, जो कि उद्देश्यपूर्ण होती है। साथ ही लक्ष्य प्राप्ति के लिए एक व्यवस्था और समन्वयक का प्रतीक भी है। इस तरह की लिखावट वाला व्यक्ति तर्क पर अधिक विश्वास करता है। अतिसंवेदनशीलता तथा सहयोग की भावना प्रमुख रूप से पाई जाती है। कभी-कभी अक्षरों में अत्यधिक संयुक्तता व्यक्ति में कंजूसी और शक्की प्रवृत्ति को भी प्रदर्शित करती है।   जिन व्यक्तियों की हस्तलिपि लघु आकार की होती है। यह दर्शाती है कि व्यक्ति अपनी ऊर्जा को विचारने में अधिक समय लगाता है। इस तरह की लिखावट वाले सैद्धांतिक मस्तिष्क वाले व्यक्ति हो सकते हैं। अत: किसी भी कार्य को करने से पूर्व में खूब सोच-समझ लेते हैं। उनमें एकाग्रता और आत्मविश्वास का अभाव भी झलकता है। इसके विपरीत हस्तलिपि में चौड़ाई, शुद्ध और संगत दूरी प्रबल चेतन इच्छाशक्ति की द्योतक है।  चौड़ा लेखन प्राय: मजबूत प्रकृति वालों का होता है और दैनिक जीवन में भावनात्मक समायोजन को इंगित करता है।शब्दों में अंतराल यह दर्शाता है कि व्यक्ति में स्वाभाविकता और उन्मुक्त भावनाएँ हैं।   कुछ व्यक्ति भारी दाब से युक्त चौड़ी लिपि लिखते हैं। यह उनकी विस्तारवादी प्रकृति और स्वतंत्रता का परिचायक है। रहने और कार्य करने के लिए अधिक स्थान को प्राथमिकता देता है। स्पष्ट वक्ता तथा महत्वाकांक्षी व्यक्ति होता है। साथ ही किसी भी तरह के बंधन को स्वीकार नहीं करता। स्वभाव से अहंकारी, अभिमानी तथा कल्पना प्रधान होता है। कभी-कभी इस तरह की हस्तलिपि वाले व्यक्तियों में मुख्य बिंदु से भटकने की मनोवृत्ति और स्पष्ट दृष्टिकोण का अभाव पाया जाता है।  विश्लेषण के लिए हस्तलेखन का कई स्पष्ट श्रेणियों में वर्गीकरण किया जाता है। इनमें से तीन प्रमुख हैं जिन्हें कोणीय, मालावत तथा धागावत जैसे नामों से जाना जाता है।   कोणीय लेखन में एक व्य‍वस्थित गति होती है, जो अनुकूलन के प्रति अस्वीकृति व्यक्त करती है। इस तरह की हस्तलिपि वाले व्यक्ति अधिक विश्वसनीय तथा समझौते के प्रति उसमें दृढ़ता पाई जाती है। ऐसे व्यक्ति कुछ झगड़ालू किस्म के भी हो सकते हैं।   मालावत लिपि, जो कि प्रयासहीन और सुगम होती है और प्राय: अनुकूलन क्षमता रखती है। ऐसी लिपि वाले व्यक्तियों में शांतिप्रियता, उत्तरदायित्व भी भावना, पर्याप्त साहस, सहनशीलता, दयालु प्रवृत्ति पाई जाती है। इस तरह के व्यक्ति तर्क से बचते हैं और प्रतिरोध वाला मार्ग चुनते हैं। नेतृत्व की अपेक्षा अनुसरण प्रिय होते हैं। मानवतावादियों के लेखन में गहरी मालाएँ पाई जाती हैं।   अवसरवादी व्यक्तियों में धागावत लेखन पाया जाता है जो कि स्वयं को परिस्थिति के अनुसार बना लेते हैं। ये योग्य, तीक्ष्ण बुद्धि और दूरदर्शी पाए गए हैं। स्वयं लाभ हेतु सृजनात्मक कार्य करते हैं और अति नैतिकतावादी नहीं होते। स्थापित परंपराओं में विश्वास नहीं रखते। धोखा देने की प्रवृत्ति प्रबल होती है, किंतु अपने चयनित क्षेत्र में अद्‍भुत कौशल का प्रदर्शन करते हैं।   सिर्फ लिखावट से ही व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता, फिर भी एक हद तक सतही जानकारी हासिल की जा सकती है, किंतु अभ्यास के सहारे इस क्षेत्र में महारत मिलना असंभव नहीं है।   
 The Chances of Foreign Travel - विदेश यात्रा के योग :

   विदेश में कितने समय के लिए वास्तव्य होगा, यह जानने के लिए व्यय स्थान स्थित राशि का विचार करना आवश्यक होता है। व्यय स्थान में यदि चर राशि हो तो विदेश में थोड़े समय का ही प्रवास होता है।  विदेश यात्रा के योग के लिए चतुर्थ स्थान का व्यय स्थान जो तृतीय स्थान होता है, उस पर गौर करना पड़ता है। इसके साथ-साथ लंबे प्रवास के लिए नवम स्थान तथा नवमेश का भी विचार करना होता है। परदेस जाना यानी नए माहौल में जाना। इसलिए उसके व्यय स्थान का विचार करना भी आवश्यक होता है। जन्मांग का व्यय स्थान विश्व प्रवास की ओर भी संकेत करता है।   विदेश यात्रा का योग है या नहीं, इसके लिए तृतीय स्थान, नवम स्थान और व्यय स्थान के कार्येश ग्रहों को जानना आवश्यक होता है। ये कार्येश ग्रह यदि एक दूजे के लिए अनुकूल हों, उनमें युति, प्रतियुति या नवदृष्टि योग हो तो विदेश यात्रा का योग होता है। अर्थात उन कार्येश ग्रहों की महादशा, अंतरदशा या विदशा चल रही हो तो जातक का प्रत्यक्ष प्रवास संभव होता है। अन्यथा नहीं।          इसलिए इस बारे में सबसे महत्वपूर्ण स्थान होता है व्यय स्थान। विदेश यात्रा का निश्चित योग कब आएगा, इसलिए उपरोक्त तीनों भावों के कार्येश ग्रहों की महादशा-अंतरदशा-विदशा पर गौर करने पर सही समय का पता किया जा सकता है।   विदेश में कितने समय के लिए वास्तव्य होगा, यह जानने के लिए व्यय स्थान स्थित राशि का विचार करना आवश्यक होता है। व्यय स्थान में यदि चर राशि हो तो विदेश में थोड़े समय का ही प्रवास होता है। व्यय स्थान में अगर स्थिर राशि हो तो कुछ सालों तक विदेश में रहा जा सकता है। यदि द्विस्वभाव राशि हो तो परदेस आना-जाना होता रहता है। इसके साथ-साथ व्यय स्थान से संबंधित कौन-से ग्रह और राशि हैं, इनका विचार करने पर किस देश में जाने का योग बनता है, यह भी जाना जा सकता है।   सर्वसाधारण तौर पर यदि शुक्र का संबंध हो तो अमेरिका जैसे नई विचार प्रणाली वाले देश को जाने का योग बनता है। उसी तरह अगर शनि का संबंध हो तो इंग्लैंड जैसे पुराने विचारों वाले देश को जाना संभव होता है। अगर राहु-केतु के साथ संबंध हो तो अरब देश की ओर संकेत किया जा सकता है।   तृतीय स्थान से नजदीक का प्रवास, नवम स्थान से दूर का प्रवास और व्यय स्थान की सहायता से वहाँ निवास कितने समय के लिए होगा यह जाना जा सकता है।  
 1. नवम स्थान का स्वामी चर राशि में तथा चर नवमांश में बलवान होना आवश्यक है।  
2. नवम तथा व्यय स्थान में अन्योन्य योग होता है।  
3. तृतीय स्थान, भाग्य स्थान या व्यय स्थान के ग्रह की दशा चल रही हो। 
4. तृतीय स्थान, भाग्य स्थान और व्यय स्थान का स्वामी चाहे कोई भी ग्रह हो वह यदि उपरोक्त स्थानों के स्वामियों के नक्षत्र में हो तो विदेश यात्रा होती है।  यदि तृतीय स्थान का स्वामी भाग्य में, भाग्येश व्यय में और व्ययेश भाग्य में हो, संक्षेप में कहना हो तो तृतियेश, भाग्येश और व्ययेश इनका एक-दूजे के साथ संबंध हो तो विदेश यात्रा निश्चित होती है।  
 Sun in Sagittarius Lagna - धनु लग्न में सूर्य मंगल लग्न में हो तो भाग्यवृद्धि :

   धनु लग्न गुरु प्रधान होने के साथ-साथ द्विस्वभाव लग्न है। धनु लग्न वाले जातक मिलीजुली कद-काठी के होते हैं। ये ईमानदार छवि के होते हैं। इनकी महत्वाकांक्षाएँ भी अधिक होती हैं। इनका स्वभाव गुरु की स्थिति पर निर्भर करता है।   गुरु यदि लग्न में हों तो गोल चेहरा व गेहुँआ रंग लिए होते हैं। स्वभाव से ईमानदार, प्रसन्नचित्त रहने वाले भी होते हैं। ऐसे जातक धर्म-कर्म को मानने वाले ईश्वरभक्त होते हुए विद्वान होते हैं। गुरु लग्न में पंचमहापुरुष योग में से एक हंस योग गुरु के केंद्र में स्वराशिस्थ होने से बनता है। गुरु के पंचम भाव पर मि‍त्र मंगल की राशि मेष पर होने से विद्या में उत्तम होते हैं।   संतान का सुख देरी से मिलता है। सप्तम बुध की राशि मिथुन पर पड़ने से पत्नी या पति का स्वभाव ठीक व सरल होता है, लेकिन सुंदर अधिक नहीं होता। गुरु की नवम दृष्टि सूर्य की सिंह राशि पर अतिरिक्त पड़ने से भाग्यशाली होकर धर्म-कर्म को जानने वाले यशस्वी होते हैं। गुरु यदि नीच का हो तो धन की बचत नहीं होती, व्यर्थ खर्च में व्यय होता है।   कुटुम्बीजन इनके धन का उपयोग करते हैं। कुछ व्यसनी भी हो सकते हैं। माता, भूमि, भवन से विशेष लाभ नहीं मिलता, लेकिन आयु के मामलों में भाग्यशाली होते हैं। गुरु पंचम में हो तो विद्या स्वप्रयत्नों से उत्तम हो। मंगल लग्न में हो तो धन अच्छा रहे। नवमेश सूर्य लग्न में हो तो ऐसा जातक भाग्यशाली होता है व भाग्य सदैव साथ देता रहता है। पंचमेश मंगल नवम में हो व नवमेश पंचम में लग्नेश लग्न में हो तो ऐसे जातक धन-संपत्तिवान, भाग्यवान, धर्मनिष्ठ, विद्यावान होते हैं। यश की इन्हें कोई कमी नहीं होती।   इस लग्न में गुरु-मंगल-सूर्य की स्थिति यदि लग्न में हो तो चतुर्थ में हो तो लक्ष्मीनारायण योग होने से ऐसे जातक लक्ष्मीपुत्र होते हैं। धन-धान्य, वाहनादि से युक्त होकर यशस्वी होते हैं। ऐसे जातक प्रशासक, राजदूत, राजनीति में अग्रणी, मंत्री जैसे पद तक पहुँचने वाले होते हैं। पंचमेश द्वादश में स्वराशिस्थ होकर बैठा हो तो ऐसे जातक विद्या अध्ययन के लिए विदेश जाते हैं। लग्नेश गुरु द्वादश में हो तो माता से, बाहरी व्यक्तियों से, विदेश से या जन्मस्थान से दूर जाकर अच्छी सफलता अर्जित करते हैं। आयु उत्तम होती है।   धनु लग्न में यदि शनि उच्च का हो व शुक्र एकादशेश धन द्वितीय भाव में हो तो ऐसे जातक अपने जीवन में धनाढ्‍य बनते है। पंचमेश मंगल उच्च का हो तो विद्या भी अच्छी मिलती है। कुटुम्बियों का सहयोग भी रहता है। सप्तमेश, दशमेश बुध धन कुटुम्ब में हो तो पत्नी या पति से अच्छा धनलाभ होता है। ससुराल पक्ष भी मजबूत होता है। पिता से लाभ रहता है।   एक उदाहरण- कुंडली में जो धनु लग्न में जन्मा होकर लग्न में गुरु है वहीं पंचमेश मंगल लग्नस्थ गुरु को देख रहा है। मांगलिक होते हुए भी मंगल दोष नहीं लगता। गुरु लग्न में होने से जातक का चेहरा गोल, गेहुँवे रंग का है। गुरु की पंचम चंद्र पर पंचम दृष्टि गजकेसरी योग बना रही है। वहीं भाग्य पर मित्र दृष्टि इस प्रकार देखा जाए तो ऐसा बालक विद्यावान, सम्पत्तिवान, यशस्वी होगा।   मंगल की सप्तम से उच्च दृष्टि व सप्तमेश का द्वितीय में होना पिता, पत्नी से लाभकारी बनाएगा। भाग्येश सूर्य शनि की मकर राशि पर व शनि भाग्य में होने से राशि परिवर्तन राजयोग बनता है। इस बालक की पत्रिका में कई राजयोग हैं- जैसे गजकेसरी योग, हंस योग, लक्ष्मीनारायण योग, राशि परिवर्तन राजयोग। धनु लग्न वालों के लिए पुखराज, माणिक, मूँगा पहनना शुभ रहेगा। जब गुरु, मंगल, सूर्य शुक्र स्थित हो।   शुभ रंग पीला, सुनहरी, लाल। शुभवार गुरु, रवि, मंगल। शुभ तारीख 3, 1, 9 इनके जोड़ वाली भी। शुभ दिशा पूर्व रहेगी। इनके अच्छे मित्र मेष, मिथुन, सिंह, राशि वाले होंगे। गुरु मंगल सूर्य की महादशा या इनकी अंतर्दशा उत्तम रहेगी। शनि व बुध मारक रहेंगे। अत: नीलम व पन्ना नहीं पहनें।   
Open the door of the mind ... That dream Money dreams, dreams of wealth - खोलो मन के द्वार... कि सपने आते हैं धन के सपने , सपनों का धन     सपने सभी देखते हैं।
 सपनों का मन से गहरा रिश्ता होता है। मन जितना निर्मल और पारदर्शी होगा, सपने भी उतने ही स्पष्ट, सटीक और सुलझे हुए दिखाई देंगे। हमारी इंद्रियाँ स्वप्नावस्था में जागृतावस्था की तुलना में अधिक संवेदनशील हो जाती है। अपनी अंतर्बोध क्षमता से हम सपनों को समझ सकते हैं।   कई बार विचित्र किस्म के सपने आते हैं जिनका वर्तमान परिवेश से तालमेल बैठाना मुश्किल होता है। एकाग्र होकर, सपनों की स्पष्ट समझ के साथ, गहराई से विश्लेषण करें तो उनके संकेत और परिणामों को जानने में सफलता मिल सकती है।  आज हर आँखों का सपना है 'धन'। और बात यदि धन के सपनों की करें तो स्वाभाविक जिज्ञासा होगी कि आखिर उन सपनों के संकेत क्या होते हैं। धन के सपनों में प्रमुख रूप से जल, श्वे रंग, फूल, फल, पशु, अनाज, पात्र और देवी-देवता का महत्व है।  जल जल अर्थात् पानी का धन-दौलत से बहुत करीब का संबंध माना गया है। दोनों ही समान गुणधर्मी होते हैं। दोनों की प्रकृति है बहना। यदि कद्र न की जाए, सहेज कर न रखा जाए तो दोनों बह जाते हैं।          इ‍सलिए सपने में वर्षा होती दिखे। व्यक्ति स्वयं कुएँ से पानी भरे तो यथाशीघ्र धन लाभ की संभावना है। सपने में तैरना मात्र ही असीमित धन-आगमन का सूचक है। सपने में नदी अथवा समुद्र-दर्शन भी अकस्मात धन प्राप्ति का संकेत है।  श्वेत रंग      स्वप्न विज्ञानियों की मान्यता है कि सपने में सफेद रंग का विशेष महत्व होता है। इस रंग को सुख-समृद्धि, शांति एवं सौजन्य का प्रतीक माना गया है। इसलिए सपने में सफेद वस्त्र देखना, सफेद वस्त्र धारण करना, श्वेत फूलों की माला देखना, सफेद बर्फ से ढँका पर्वत देखना, सफेद समुद्र, सफेद मंदिर का शिखर, सफेद ध्वजा, शंख और श्वेत सूर्य-चंद्र आदि समृद्धि एवं प्रचुर मात्रा में धनागमन का संकेत हैं।   फल     स्वप्नशास्त्री के. मिलर के अनुसार सपने में स्वयं के हाथों में फल टपके, फल वाले वृक्षों का दर्शन करें, आँवला, अनार, सेब, नारियल, सुपारी एवं काजू आदि को देखें तो धन आने की प्रबल संभावना है। फल का सेवन अलग-अलग स्वप्न विशेषज्ञों की राय में शुभ-अशुभ दोनों माना गया है जबकि केले के संबंध में अधिकांश विशेषज्ञ एकमत हैं कि वह अशुभ है और कई मामलों में मृत्युसूचक या मृत्युतुल्य कष्ट सूचक भी।       सपने में व्यक्ति अनाज के ढेर पर स्वयं को चढ़ता देखे और उसी समय उसकी नींद खुल जाए तो धन लाभ, निश्चित समझे। उसी तरह चावल, मूँग, जौ, सरसों आदि भी धन प्राप्ति का संकेत देते हैं।  पात्र कलश, पानी से भरा घड़ा और बड़े पात्रों को धन आगमन का सुनि‍श्चित प्रतीक माना गया है। एक सपने के विषय में दुनिया भर के स्वप्नशास्त्री एकमत है। उनके अनुसार मिट्‍टी का पात्र देखना सर्वश्रेष्ठ होता है। ऐसे व्यक्ति को शीघ्र ही अपार धन संपदा की प्राप्ति होती है। साथ ही भूमि लाभ भी मिलता है।  दैवीय प्रतीक      भारतीय स्वप्न विशेषज्ञों के अनुसार सपने में ‍िपतृ अथवा दिवंगत पूर्वजों का दर्शन एवं उनके आशीर्वाद विशेष सफलतादायक है। मंदिर, शंख, गुरु, शिवलिंग, दीपक, घंटी, द्वार, राजा, रथ, पालकी, उजला आकाश एवं पूनम का चंद्र आदि भी विशेष समृद्धिदायक एवं भाग्योदय का प्रतीक माने गए हैं।  उपरोक्त समस्त संकेत हैं धनागमन के, किंतु कर्म, प्रयास और परिश्रम न किए जाएँ तो सपने फिर सपने होते हैं। सपने कब अपने होते हैं।   इन संकेतों से प्रेरणा लेकर अपने कार्यों की रूपरेखा तैयार करना तो ठीक है किंतु उनके भरोसे बस हाथ पर हाथ धरे सपना साकार होने का इंतजार करना नादानी है।  बकौल शायर सपना झरना नींद का जागी आँखें प्यास पाना, खोना, खोजना साँसों का इतिहास  सच तो यह है कि सुरमई अँखियों में सजा नन्हा-मुन्ना सपना अपना हो तो जाएगा लेकिन इसके लिए थोड़ा 'तपना' पड़ेगा। इस 'तपने' में ही सपने का 'असली अर्थ' छिपा है।   
 Dreams  No luck creator, a man writes - भाग्य विधाता नहीं, मनुष्य लिखता है :

   कोई भी बच्चा अशुभ ग्रहों में न हो शुभ ग्रहों का प्रभाव उसके जीवन में हो। इसके लिए हमें भाग्य विधाता के भरोसे नहीं रहना चाहिए। पुरुष व स्त्री के संगम से ही स्त्री को गर्भ धारण होता है। हाँ कुछेक केस में कृत्रिम गर्भधारण भी होता है, लेकिन बात कोई भी हो। बच्चे के जन्म के समय ग्रहों की शुभ स्थिति हो तो ऐसा हमारे वश में ही है न कि भाग्य विधाता के। बच्चा जन्म 9 माह में लेता है तो किसी जननी को सातमासा या अष्टमासा बच्चा भी हो सकता है।   कुल मिलाकर बच्चे का जन्म 7 से 9 माह के मध्य ही होता है। कुछेक केस में 10 से 12 माह के मध्य भी सुनने को मिला है। लेकिन ऐसा केस बिरले ही होता है। आजकल शुभ मुहूर्त में बच्चे का जन्म सिजेरियन द्वारा भी करवाया जाता है, लेकिन वो उचित नहीं है। प्राकृतिक ही रूप से जन्म होना ही सही होता है।   जब बच्चा जन्म ले रहा है या सिजेरियन द्वारा जन्म कराया जा रहा है। उस समय ग्रहों की युति ग्रहों की स्थिति क्या है। वो किस दिन किस स्थिति में जन्म ले रहा है या तिथि, दिन-वार भी सही है। शुभ मुहूर्त भी है लेकिन ग्रहों की युति की समझ हर किसी को नहीं होती।          अशुभ योग हो व बच्चे का जन्म शुभ मुहूर्त में हो तो वो किसी भी प्रकार के अशुभ योगों से बचा नहीं रह सकता। बच्चे को अशुभ योगों से बचाना ही हर दंपति के हाथ में होता है। अशुभ योग में सबसे खतरनाक योग शनि, मंगल की युति या दृष्टि संबंध ही मेरे अनुभव में आया है।   ऐसी स्थिति वाला जातक करोड़ों में खेलने वाला कंगाल हो गया। लाख प्रयास करने पर भी सफलता हाथ नहीं लगी। किसी-किसी घर में एक नहीं सभी को अशुभ योग में जन्मते देखा। खुशहाल परिवार मेरे ही सामने बर्बाद होता देखा गया है। जब से मैंने इसी पर ध्यान दिया कि क्यों न हम इन अशुभ योगों में बच्चे का जन्म ही न होने दें।  संतान इच्छुक दंपति इस ओर ध्यान देकर लाभान्वित हो सकते हैं व अशुभ योग से अपने बच्चे को बचा सकते हैं। बच्चे का प्लान करने वाले दंपति कुछ विशेष समयावधि में स्त्री को गर्भ धारण कराए तो उनका बच्चा अशुभ योगों से बचा रह सकता है।  इस‍के लिए हमें यह ध्यान रखना होगा कि बच्चा जन्म ले उस माह में अशुभ ग्रहों की युति न हो न ही दृष्टि संबंध हो। बस आपका बच्चा अशुभ योग से बच जाएगा व उसके जीवन में बाधाएँ नहीं आएँगी।
  From the Terot Card World - टैरो कार्ड की रहस्यमयी दुनिया से  :

  टैरो, कागज के चंद रंगीन कार्डों की रहस्यमय दुनिया, जिसके जरिए आपका भविष्य जाना जा सकता है। इस शब्द की उत्पत्ति भी रहस्यमय है। टैरो सिर्फ शब्द नही, भविष्य और जीवन है।  कुछ मानते है यह टैरोची शब्द से उत्पन्न हुआ है, जो माइनर आर्काना के कार्डों से संबंधित थ, तो कुछ इसकी उत्पत्ति टैरोटी से मानते हैं क्रॉस लाइन जो कि कार्डों के पीछे दिखती है। यह तो रही रहस्यमय संसार की रहस्यमय कहानी। आपके भविष्य में क्या कुछ होने वाला है इसकी भविष्यवाणी टैरो की जुबानी।          यदि आप भी इस रहस्यमय विधा के बारे में कुछ जानना-समझना चाहते हैं तो वेबदुनिया आपके लिए लाया है यही रहस्यमयी दुनिया। बस इस लिंक पर क्लिक कीजिए -   टैरो कार्ड की रहस्यमय दुनिया   टैरो डेक में 78 कार्ड होते हैं जो मेजर आर्काना और माइनर आर्काना में कहलाते हैं। आर्काना लैटिन भाषा के शब्द आर्कान्स से उत्पन्न हुआ,जिसका अर्थ है- रहस्यमय। व्यक्तिगत विकास के रहस्यों से प्रतीकात्मक रूप से अभिलेखित शिक्षाएँ लिए मेजर आर्काना गुप्त विज्ञान के छात्रों का गंभीर विषय है।   धार्मिक समूहों और विभिन्न भूमिगत जातियों का गुप्त शिक्षा अंकन। टैरो का दर्शन कबाला से उत्पन्न हुआ है। शब्दों और अंकों की दैवीय शक्ति से सम्पन्न टैरो आज भविष्य दर्शन का लोकप्रिय माध्यम है। तो फिर वेबदुनिया के साथ चलिए इस रहस्य और भविष्य दर्शन की अनोखी विधा को समझने।     
 Mercury, Venus - बुध, शुक्र देगा कन्‍या लग्‍न को राजयोग :

    कन्‍या लग्‍न, बुध प्रधान लग्‍न है। यह द्विस्‍वभाव लग्‍न होने से जातक का मन एक जगह स्‍थिर नहीं रहता। यदि वे एक मत होकर कार्य करें तो प्रत्‍येक क्षेत्र में अच्‍छी सफलता पाने वाले होते हैं। बुध प्रधान लग्‍न होने के कारण उनका बौद्धिक स्‍तर अच्‍छा होता है। इनमें सोचने-समझने की शक्‍ति उत्तम होती है।   लग्‍नेश की स्थिति दशम भाव में हो तो ऐसे जातक अपने पिता के सहायक होते हैं। पिता के व्‍यापार में सहयोगी होने के साथ-साथ अच्‍छी सफलता पाने वाले होते हैं। बुध स्‍वराशिस्‍थ होने से पंचमहापुरुष योग में से एक भद्र योग बनाता है। ये राजनीति में हो तो शिखर तक पहुँचना इनके लिए कोई मुश्‍किल कार्य नहीं है।   सर्विस में हों तो अच्‍छे कार्यकुशल होते है। अक्‍सर लिखा-पढ़ी वाले कार्यों में सफलता मिलती है। बुध यदि द्वादश भाव में हो तो अपने मित्र सूर्य की सिंह राशि में होगा एवं बुध उच्‍चाभिलाषी होने से इनकी आकांक्षाएँ भी ऊँची होंगी। ये बाहर रहकर या विदेशों में भी रहकर अच्‍छी सफलता पाते हैं। गुरु-बुध साथ होने पर अपने जीवनसाथी से अच्‍छा सहयोग मिलता है और माता से भी लाभ पाने वाला होता है। ये अक्‍सर शासकीय सर्विस में या मैनेजमेंट में होते हैं।        पंचमेश शनि त्रिकोण व षष्‍टेश होने से इतना शुभ फलदायी नहीं रहता है, फिर भी शनि की पंचम भाव में स्‍थिति उस जातक को शनै:-शनै: सफलता दिलाती है। ऐसे जातक विद्या में सफल होते हैं, लेकिन बाधाएँ अवश्‍य आती रहती हैं। धन कुटुम्‍ब से ऐसे जातक पूर्ण कहे जा सकते हैं। लग्‍नेश बुध साथ हो तो विद्या के क्षेत्र में अच्‍छी सफलता पाने वाले होते हैं और लक्ष्‍मी पुत्र होते हैं।  शुक्र का भी साथ मिल जाए तो इनके यहाँ लड़का व लड़की दोनों ही होते हैं और इनकी संतान भाग्‍यशाली होती है। विद्या में अग्रणी चिकित्‍सक या इंजीनियरिंग में अच्‍छी सफलता पाने वाले होते हैं। धन की इन्‍हें कमी नहीं रहती। शनि की शुक्र स्‍थिति नवम् द्वादश में उत्तम रहती है। शुक्र इनके लिए सर्वाधिक कारक होता है।    भाग्‍येश त्रिकोण में सबसे बली नवम् भाव को माना गया है। भाग्‍येश भाग्‍य में हो तो ऐसे जातकों का भाग्‍य सदैव साथ देता रहता है। ऐसे जातक 30 सेंट का हीरा तर्जनी या अँगूठे में पहनें तो अच्‍छा लाभ मिलता है। शुक्र द्वितीय धन भाव में हो तो भाग्‍येश धन में होने से धन की कमी महसूस नहीं रहती।  द्वितीयेश मार्केश होता है, लेकिन त्रिकोणेश में बली त्रिकोणेश होने से शुक्र मार्केश नहीं होता है। इनकी आवाज मधुर होती है। शुक्र के साथ शनि होकर नवम् भाव में हो तो ये सफल चिकित्‍सक बन सकते हैं या इंजीनियर भी हो सकते हैं। इन्‍हें ऑटोमोबाइल या कम्प्‍यूटर साइंस में भी अच्‍छी सफलता मिल सकती है। ये अच्‍छे नेत्र सर्जन भी हो सकते हैं। शुक्र की स्‍थिति पंचम, सप्‍तम में द्वितीय भाव में शुभ रहती है।   कन्‍या लग्‍न के साथ-साथ कन्‍या, तुला या मकर राशि हो या मिथुन-वृषभ राशि हो तो ऐसे जातक को हीरा व पन्‍ना पहनना शुभ रहेगा। हरा, सफेद, चमकीला, आसमानी रंग शुभ फलदायी रहेगा। ऐसे जातक को हमेशा हरा या सिल्‍वर रंग का पेन इस्‍तेमाल करना चाहिए।   वाहन लेना हो तो आसमानी, हरा, सिल्‍वर रंग उपयुक्‍त रहेगा। दक्षिण, पश्‍चिम दिशा शुभ रहेगी। वहीं 5,6,2,4,8 और इनको जोड़ने वाले अंक शुभ रहेंगे। शुक्रवार, बुधवार, शनिवार क्रमश: शुभ फलदायी रहेंगे।   कन्‍या लग्‍न वालों के लिए उत्तम जीवनसाथी, मकर, मीन, तुला लग्‍न वाले होंगे। तुला लग्‍न या तुला, वृषभ राशि वालों से भाग्‍य चमकेगा। इनकी कुंभ व मेष राशि वालों से नहीं बनेगी।   
 Bagair Mangal - बगैर मंगल वाले वर-वधू की शादी हो सकती है  एकादशमेश मंगल लग्‍न में हो तो मंगल दोष नहीं लगे :

  एकादशमेश मंगल जो आयभाव व शत्रु माना जाता है, षष्ठ भाव का स्‍वामी होकर यदि लग्‍न में हो तो मांगलिक दोष नहीं माना जाएगा, क्‍योंकि सप्‍तम भाव वर या कन्‍या का होता है। लग्‍न से मंगल सप्‍तम भाव पर उच्‍च दृष्‍टि डालेगा। इस कारण मंगल दोष नहीं लगता है। लग्‍न में मंगल होने के कारण ऐसे जातक स्‍वप्रयत्‍नों से धनलाभ पाते हैं। उन्‍हें माता, भूमि, भवन का सुख मिलता है।   पत्‍नी या पति तेजस्‍वी स्‍वभाव के होते हैं। आयु उत्तम होती है। लग्‍न के साथ सूर्य हो तो ऐसे जातक को मित्रों, भाइयों का पूर्ण सहयोग मिलता है। शत्रु नहीं होते हैं, पराक्रमी होता है। चंद्र साथ में होने पर कुंडली में समस्‍त दोषों का निवारण होता है। ऐसा जातक धन-कुटुम्‍ब से पूर्ण होता है। वाक् शक्‍ति अच्‍छी होती है। बुध साथ हो तो ऐसा जातक सफल व्‍यापारी, राजनीतिज्ञ भी हो सकता है। इसमें हिम्‍मत गजब की होती है।   गुरु साथ होने पर गणितज्ञ और ज्ञानवान होता है। ऐसे जातक अपने जीवनसाथी के प्रति वफादार होते हैं, मंगल दोष नहीं होता है। शुक्र साथ होने पर ऐसे जातक सेक्सी होते हैं और उनके संबंध अन्‍यत्र भी हो सकते हैं। वे विद्या और लेखन में अच्‍छे होते हैं। शनि साथ हो तो आय में कमी, शत्रु से परेशान, स्‍वयं मेहनत करने पर भी सफलता नहीं मिलती। ऐसी स्‍थिति में मंगल का उपाय व सोना-चाँदी-ताँबे के तारों में गुँथी हुई अँगूठी बनावाकर पहनें। राहु साथ होने पर सफल राजनीतिज्ञ बन सकता है। ऐसे जातक चतुर चालाक भी होते हैं।        केतु साथ हो तो जीवन में एक बार एक्‍सीडेंट होता है या सिर पर चोट आदि लगती है। एकादशेश मंगल द्वितीय भाव में हो तो उस जातक का धन कुटुम्‍बी लोग हजम कर जाते हैं या शेयर आदि में हो तो धन नष्‍ट हो जाता है। वाणी के भी कड़क होते हैं। सूर्य साथ होने पर वाणी दोष संभव है। पराक्रम द्वारा थोड़ी सफलता मिलती है।   चंद्र साथ हो तो मंगल का नीच भंग होने से ऐसे जातक धनवान होते हैं। वाणी मधुर लेकिन सख्‍त होती है। बुध साथ हो तो अपने बल पर कुटुम्‍ब का सहयोग करने वाले होते हैं। गुरु साथ होने पर राज्‍य कृपा, पिता से लाभ होता है। शुक्र साथ हो तो आवाज मधुर होती है, ऐसे जातक गायन में सफल हो सकते हैं।   शनि साथ हो तो जीवनसाथी को खतरा होता है। कुटुम्‍बियों से नहीं बनती है। धन की बचत नहीं होती है। आँखों की ज्‍योति कम हो जाती है या चोट लगती है। राहु साथ हो तो अनावश्‍यक परेशानियाँ आती हैं।  कभी-कभी तो जेल भी जाना पड़ सकता है। केतु साथ होने पर आँखों में चोट लगती है। कुटुम्‍बियों से अनबन रहती है। एकादशेश मंगल तृतीय में हो तो ऐसे जातक के शत्रु नहीं होते। वो बड़ा पराक्रमी, साहसी, महत्‍वाकांक्षी होता है। भाई अधिक होते हैं। मंगल साथ सूर्य हो तो स्‍वप्रयत्‍नों से ऊँचाइयों पर पहुँचता है। भाइयों, मित्रों का लाभ पाने वाला, शत्रुहंता होता है।   चंद्र साथ हो तो शत्रु पर शांति नीति से सफल होता है व गुणी होकर आवाज मधुर होती है। बुध साथ हो तो माता, भूमि, भवन में स्‍वप्रयत्‍नों से लाभ पाने वाला होता है। मान-प्रतिष्ठा बढ़ती है। गुरु साथ होने पर पत्‍नी या पति साहसी, उत्तम चरित्र वाले होते हैं। आर्थिक दृष्‍टि से सबल होते हैं। शुक्र साथ हो तो सुंदर होने के साथ विद्या उत्तम होती है।   शनि साथ होने पर भाई, मित्र, पड़ोसियों से नहीं बनती। आय में भी कमी रहती है। राहु साथ हो तो शत्रु न हो। गुप्‍त युति से लाभ मिले। केतु साथ हो तो भाई-भाई में न बने। अलग रहना पड़े। एकादशेश मंगल चतुर्थ के हो तब भी मांगलिक पत्रिका नहीं मानी जाएगी क्‍योंकि मंगल की चतुर्थ दृष्‍टि सप्‍तम भाव पर मित्र पड़ेगी, वहीं सप्‍तम दशक भाव पर मित्र और एकादश भाव पर स्वदृष्‍टि पड़ेगी। अत: ऐसे जातक की आय जनता से संबंधित कार्यों से होती है और मकान का सुख उत्तम रहता है। आय भी अच्‍छी रहती है। पिता व राज्‍य से लाभ मिलता है।   मंगल के साथ सूर्य हो तो स्‍थानीय राजनीति में सफल होता है। भाइयों का साथ अच्‍छा रहता है। मान-प्रतिष्‍ठा पाने वाला होता है। चंद्र साथ हो तो धन-कुटुम्‍ब से पूर्ण होता है। माता से लाभ और जनता से संबंधित कार्यों में सफलता मिलती है। बुध साथ हो तो स्‍थानीय राजनीति में, विधायक में सफलता पाता है।   व्‍यापार में हो तो सफल व्‍यापारी होता है। गुरु साथ हो तो पिता से, शासकीय सर्विस में, राजनीति में सफल होता है। सास-ससुर से भी लाभ, व्‍यापार में उन्‍नति हो ऐसे जातक हीरा पहने तो अच्‍छा होता है। शनि साथ हो तो माता न हो, स्‍थानीय कार्यों में क्षति, मकान न हो। राहु साथ होने पर राजनीति में सफल हो। केतु साथ हो तो माता का साथ न रहे।       
 Ekadash Mangal - एकादशेश मंगल सप्तम हो तो जीवनसाथी से लाभ :

    आयेश मंगल जब मेष राशि का होकर पंचम विद्या, बुद्धि, संतान, मनोरंजन, प्रेम भाव में हो तो थोड़ी इन बातों में कमी के बाद परिश्रम द्वारा सफलता मिलती है। आय भाव का स्वामी यहाँ से आय को देखने से आय में कमी नहीं लाता है।   मंगल के साथ सूर्य हो तो संतान कष्ट होता है या गर्भपात की नौबत आती है। विद्या में परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। चंद्र साथ हो तो मिले-जुले परिणाम मिलते हैं। बुध साथ हो तो प्रयत्नपूर्वक सफलता मिलती है। गुरु साथ होने पर गुरु का फल नगण्य सा हो जाता है। शुक्र साथ होने पर विद्या में उत्तम सफलता मिलती है। ऐसा जातक प्रेमी होता है। मिली-जुली संतान होती है।   शनि साथ हो तो भाग्येश उच्च का होगा लेकिन मंगल के साथ होने से नुकसानप्रद भी बनता है। संतान आदि में बाधा रह सकती है। आर्थिक मामलों में उतार-चढ़ाव रहता है। ऐसी स्थिति में मुहूर्त में बनाई गई तीन धातुएँ सोना, चाँदी, ताँबा की अँगुठी मुहूर्त में धारण करने से लाभ होता है। राहु साथ होने पर संतान को कष्ट या संतान होने में देरी होती है।        केतु साथ हो तो गर्भपात होता है व ऑपरेशन द्वारा संतान के योग बनते हैं। मंगल षष्ठ शत्रु, रोग, कर्ज नाना- भाव में हो तो एकादशेश स्वराशि का होने से शत्रु परास्त होते हैं। कर्ज हो तो दूर होता है व नाना-मामा से लाभ रहता है। विशेष मंगल की महादशा में लाभ होता है। मंगल के साथ सूर्य हो तो प्रबल रूप से शत्रु हंता होता है। मित्रों, साझेदारों से कम ही बनती है।   चंद्र साथ होने पर धन की बचत कम होती है। बुध साथ हो तो बाहर से लाभ मिलता है। गुरु साथ होने पर नौकरी, व्यापार आदि में स्वप्रयत्नों से लाभ रहता है। पिता से भी लाभ मिलता है। शुक्र साथ होने पर विदेश से या जन्मस्थान से दूर रहकर सफलता पाता है।   शनि साथ हो तो प्रबल रूप से शत्रु नाश हो लेकिन नाना-मामा का घर ठीक न हो। नाना-मामा के लिए ऐसे जातक नुकसानप्रद रहते हैं। राहु साथ होने पर गुप्त शत्रुओं से परेशान रहता है व कर्ज भी हो सकता है। बवासीर के रोग संभव है। केतु साथ हो तो पशु से चोट लगती है। एकादशेश मंगल सप्तम भाव में हो तो ऐसा जातक मांगलिक होगा लेकिन उसे मंगल दोष नहीं लगता।  ऐसे जातक का जीवन हिम्मतवान, महत्वाकांक्षी व जीवनसाथी से लाभ पाने वाला होता है। सूर्य साथ हो तो तेजस्वी स्वभाव का होता है। जीवनसाथी से वाक् युद्ध होता रहता है। लेकिन प्रेम भी बना रहता है।   चंद्र साथ हो तो पत्नी या पति से धन अच्छा मिलता है। साहसी, हिम्मतवान होता है। बुध साथ हो तो ऐसा जातक लेखक, प्रकाशक होता है। साथ ही उसकी वाक् शक्ति अच्छी होती है। पति-पत्नी में तालमेल अच्छा रहता है। गुरु साथ हो तो ऐसे जातक उत्तम विचारों से युक्त सद्‍गुणी, व्यवहारकुशल, सच्चे मित्र होते हैं। शुक्र साथ हो तो प्रेम विवाह संभव है। पति या पत्नी सुंदर हो। शनि साथ हो तो दाम्पत्य जीवन नष्ट हो सकता है या अलग-अलग रहने की नौबत आती है। राहु साथ हो तो आपस में नहीं बनती। तलाक भी संभव है।  केतु साथ हो तो परिणाम ठीक रहेंगे। लेकिन जीवनसाथी थोड़ा जिद्दी स्वभाव का होता है। एकादशेश मंगल अष्टम भाव में हो तो मांगलिक होने पर भी विशेष प्रभाव नहीं रहता। आयु उत्तम होगी, लेकिन आर्थिक मामलों में मिली-जुली स्थिति रहती है। मित्रों, भाइयों से ‍मदद मिलती है। चंद्र साथ हो तो धन के मामलों में‍ मिली-जुली स्थिति रहती है। बुध साथ हो तो भाग्योन्नति में रुकावट आती है। प्रयत्नपूर्वक अच्छी सफलता नहीं मिल पाती।   गुरु साथ हो तो पति-पत्नी में कलह, बार-बार स्थानांतरण होता रहता है। स्थायित्व की कमी रहती है। शुक्र साथ हो तो ऐसा जातक भोगी किस्म का होता है। विद्या में रुकावटें आती रहती हैं। शनि साथ हो तो आयु तो ठीक रहती है लेकिन एक्सीडेंट के योग बनते रहते हैं। राहु साथ हो तो गुप्त रोग संभव। केतु साथ होने पर ऑपरेशन की नौबत आती है।   March Borns - मार्च में जन्मे व्यक्ति अधिक महत्वाकांक्षी होते हैं     आपका जन्म किसी भी वर्ष मार्च में हुआ है तो आप यात्राओं के शौकीन होते हैं। आपमें अंतर्ज्ञान की क्षमता अधिक होती है। आप जितने साधारण दिखाई देते हैं, विचारों से उससे कहीं अधिक महत्वाकांक्षी होते हैं।   आपमें एक विशेषता यह भी है कि आप जिम्मेदारियों के पदों पर अपनी योग्यता दिखाकर सफल भी होते हैं। किसी भी विषय पर बोलने या लिखने से पहले उसके बारे में पूरी जानकारी प्राप्त कर लेना चाहते हैं। आप कानून-व्यवस्था का भारी सम्मान करने वाले होते हैं। कुछ लोग भोगी-विलासी भी होते हैं तो कुछ मादक पदार्थों का भी सेवन करने वाले होते हैं।  आप कभी-कभी ऐसा परिवर्तन भी अपने जीवन में कर देते हैं, जिससे आपके मित्र, परिचित भी आश्चर्यचकित हो जाते हैं। आप लोगों का द्विस्वभाव भी होता है। आप कभी-कभी निर्णय लेने में हिचकिचाहट महसूस करते हैं। आपमें आध्यात्मिकता और व्यावहारिकता का पुट भी रहता है। आप में गुप्त विद्याओं के प्रति भी रुझान होता है।          वैसे आपका स्वास्थ्य अधिकतम ठीक ही रहता है लेकिन आप मानसिक रूप से चिन्तित रहते हैं, जो आपके लिए हानिप्रद भी हो सकता है। आप में पाचन क्रिया की कमी होने से पेट संबंधित रोग भी हो सकते हैं। हाथ-पैरों में अधिक पसीना आना, फेफड़े की कमजोरी, आँतों में वृद्धि की संभावनाएँ अधिक रहती हैं।   वैसे आप अति महत्वाकांक्षी होने के कारण जल्द अमीर बनना चाहते हैं और कुछ गलत निवेशों में फंसकर आर्थिक नुकसान उठा लेते हैं, जिसके कारण आपकी आर्थिक स्थिति डगमगा जाती है अतः आपको जल्द पैसा कमाने वाली कंपनियों के प्रति सचेत रहना होगा।   आपका विवाह मीन, कर्क, वृश्चिक राशि वालों से उत्तम रहेगा व इन राशि नाम वालों से आपकी उत्तम बनेगी। आपके लिए शुभ रंग हल्का लाल, पीला, फालसाई रहेगा। शुभ रत्न में मूंगा मध्यमा में 5 कैरेट का बनवाकर गुरुवार को पहनें। शुभ दिशा पूर्व रहेगी।   
  Panchamesh Chandra - पंचमेश चंद्र:

तृतीय में हो तो पराक्रम से सफलता मिले     पंचमेश चंद्र मीन लग्‍न में होगा। यहाँ पंचम विद्या संतान, मनोरंजन, प्रेम-भाव का स्‍वामी होगा। चंद्र तीव्र गतिशील ग्रह है, जो शीघ्रता से फल देता है। पंचमेश लग्‍न में हो तो मीन राशि होगी। इसमें दो ग्रहों का प्रभाव रहता है।  चंद्र राशि व उसका स्‍वामी चंद्र स्‍वतंत्र हो तो ऐसे जातक स्‍वप्रयत्‍नों से विद्या पाता है। गुरु का शुभ होना आवश्‍यक है। गुरु लग्‍न में चंद्र के साथ हो तो गणितज्ञ, सीए, वकील, बैंक फर्म में या जलीय वस्‍तु के व्‍यापार- डेयरी आदि में सफलता का कारक बनता है। चंद्र के साथ सूर्य हो तो बाधा आती रहती है। विद्या में, संतान, परिश्रम में, शारीरिक स्‍वास्‍थ्‍य में कमी लाता है।  मंगल के साथ में हो तो उत्तम योग, दो त्रिकोण के मालिक मिल जाएँ तो ऐसा जातक भाग्‍यशाली होता है। यदि गुरु भी साथ हो तो लक्ष्‍मी पुत्र होगा। बुध साथ हो पत्‍नी पढ़ी-लिखी होगी। शुक्र साथ हो तो धन लाभ अच्‍छा मिलेगा। शनि साथ हो तो साँवला रंग का होगा। राहु साथ होने पर व्‍यसनी और केतु साथ होने पर जिद्दी होगा।        चंद्र पंचमेश होकर द्वितीय वाणी, धन, कुटुंब में होकर मेष राशि वाला होगा। यदि मंगल साथ हो तो धन-धान्‍य से भरपूर, वाणी सशक्‍त हो, कुटुंब से साथ मिले। स्‍वविवेक से सफलता पाने वाला होता है। शुक्र साथ हो तो उस जातक का दाम्पत्य जीवन ठीक नहीं रह पाता है, लेकिन आयु उत्तम होती है। शनि साथ होने पर धन न बचे। वाणी खराब हो और जेल भी जा सकता है। राहु साथ हो तो चतुर वाणी हो व थाप निकालने में चतुर हो। केतु साथ हो तो मानसिक चिंता दे और धन न बचे।   चंद्र तृतीय में हो तो वृषभ राशि होगी, ऐसे जातक का स्‍वर मधुर होगा, पराक्रमी रहेगा। सूर्य साथ हो तो शत्रु से परेशान, भाइयों से मनमुटाव रहे। मंगल साथ हो तो भाग्‍य से काम बने, भाई न हो, मित्रों में हानि। बुध साथ हो तो माता से सुख में कमी महसूस करें।  गुरु साथ हो तो मिले-जुले परिणाम मिले। आर्थिक लाभ में कमी मिले। शनि साथ हो तो शत्रु न हो। केतु साथ हो तो माता को कष्‍ट, सुख में कमी रहे। बार-बार स्‍थानांतरण हो। मंगल साथ हो तो भाग्‍य से सुखों में वृद्धि होगी। मांगलिक होते हुए भी मांगलिक प्रभाव न हो।  गुरु साथ हो तो पिता, राज्‍य से लाभ मिले, सुख हो। शुक्र साथ हो तो अनेक स्‍त्रियों से संबंध हों। शनि साथ हो तो माता की उम्र अधिक हो। राहु साथ हो तो राजनीति में सफलता मिले। केतु साथ होने पर माता का ऑपरेशन हो व कार्य में बाधा बने।  

Tarjani Ka Vyavharik Mahatva - तर्जनी का व्यावहारिक महत्व :  

 हाथ की पाँच उँगलियों में अँगूठे व मध्यमा के बीच की उँगली तर्जनी कहलाती है। अन्य उँगलियों की अपेक्षा इसका विशेष महत्व देखा गया है। विभिन्न नित्य कार्यों के अलावा धार्मिक कार्यों, ज्योतिष, नृत्यमुद्राओं, योग मुद्राओं आदि में इसकी भूमिका होती है। निम्न बातें (तथ्य) तर्जनी के इस महत्व को पुष्ट करती हैं-  श्रीकृष्ण ने भी सुदर्शन तर्जनी पर थामा था 
* पाँच उँगलियों में पाँच तत्व निहित हैं- अँगूठा-अग्नि, तर्जनी-वायु, मध्यमा-आकाश, अनामिका-पृथ्वी व छोटी में जल। इनमें तर्जनी का 'वायु' तत्व सभी को संतुलित रखने में सहायक होता है।   
* तर्जनी व अँगूठे के स्पर्श से की जाने वाली 'ज्ञानमुद्रा' ज्ञान वृद्धि व मानसिक शुद्धि करती है साथ ही यह मुद्रा ध्यान, योग व प्राणायाम में भी प्रयुक्त होती है।   
* नृत्य अथवा करतब में थाली या किसी चीज को इसी उँगली पर घुमाया जाता है। कहते हैं श्रीकृष्ण ने भी सुदर्शन इसी पर थामा था।        
* बाण (तीर) चलाने में अँगूठे या मध्यमा के साथ तर्जनी का संग जरूरी है।   
* चुप रहने के इशारे में इसी उँगली को मुँह पर रखा जाता है।  
 * जाने का इशारा करना, किसी को बाहर करना हो, तर्जनी ही उठती है।  
* कोई खाद्य चखना हो, इसी को डूबाकर, छूकर मुँह तक लाया जाता है।   
* इनके अतिरिक्त भी कई कार्य हैं जिनमें अँगूठे के साथ तर्जनी प्रयुक्त की जाती है जैसे- कलम पकड़ना, सुई में धागा पिरोना, कंचा फेंकना, चुटकी भरना, बटन लगाना आदि।   
 Dreams Indicates - स्वप्न देते हैं संकेत :

   हमारे प्राचीनकाल के ग्रंथों में स्वप्न विज्ञान को काफी महत्व दिया गया है। स्वप्न परमात्मा की ओर से होने वाली घटनाओं के पूर्व संकेत होते हैं। स्वप्न का प्रभाव निश्चित रूप से हर मनुष्य पर पड़ता है।   यदि कोई अच्छा-सा स्वप्न दिखाई दे तो हम खुश होते हैं, किंतु बुरा दिखाई दे तो घबराकर तुरंत ज्योतिषियों के पास पहुँच जाते हैं। स्वप्न तो छोटे-छोटे निरीह बालकों को भी नहीं छोड़ते हैं। वे नींद में कभी हँसते हैं और कभी डर से रोने लगते हैं।   स्वप्न के आधार पर फलकथन करने में ज्योतिषियों को आसानी होती है। सपनों में कुछ भी कर सकने की आजादी होती है। चाहे तो मछली को सड़क पर दौड़ा दें या गरूड़ को पानी में तैरते हुए देखें। जब मनुष्य गहरी नींद में होता है तो उसका इलेक्ट्रो एनसेफलोग्राफ (ईईजी) अल्फा तरंगों को स्थिर गति में दिखाता है, जिसमें सामान्य श्वास, नाड़ी धीमी और शरीर का तापमान कम हो जाता है। परंतु स्वप्न अवस्था में गतिशीलता बढ़ जाती है।         साँस तेज, नाड़ी तेज और तापमान भी अधिक रहता है। यह अवस्था प्रायः रात में 4-5 बार आती है। इस अवस्था में शरीर के अंग गतिमान होते हैं। नाड़ी बढ़ी हुई और मस्तिष्क जागृति वाली स्थिति का प्रकार दर्शाता है।   सपने देखना मानव जीवन की एक आवश्यक आवश्यकता है। सपने देखने में कमी होने का मतलब है आप में प्रोटीन की कमी है या फिर आप पर्सनॉलिटी डिसऑर्डर के शिकार हैं।  
 * साँप- भारतीय परंपरा में मदमस्त साँप को देखने का अर्थ है, कुंडली का जागृत होना तथा आंतरिक प्रेरणा एवं बाहरी सजग दृष्टिकोण के बीच संघर्ष के रहते सपनों में हिलते सर्प दिखाई देते हैं।  
 * पक्षी- पक्षी आत्मा या वासनाओं से मुक्ति का प्रतीक होता है। स्वप्न में पक्षी किस अवस्था में दिखता है उसी से आत्मा की स्थिति का अनुमान लगाया जाता है।    
* उड़ना- यह आत्मविश्वास या स्वतंत्रता एवं मोक्ष का दर्शन है। आधुनिक विचारधारा इसे असाधारण क्षमता के प्रतीक के रूप में देखती है।   
* घोड़े- घोड़े का दिखना स्वस्थ होने का सूचक है। यह परोक्ष दर्शन की क्षमता सुझाता है। कुछ लोग इसका संबंध प्रजनन से जोड़ते हैं।  कुछ स्वप्न और उनका प्रभाव 
* यदि स्वप्न में व्यक्ति खुद को पर्वत पर चढ़ता पाए, तो उसे एक दिन सफलता निश्चित मिलती है।   
* उल्लू दिखाई दे, तो यह रोग अथवा शोक का सूचक माना जाता है।          
* कबूतर दिखाई दे तो यह शुभ समाचार का सूचक है।   
* व्यक्ति खुद को रोटी बनाता देखे, तो यह रोग का सूचक है।   
* भंडारा कराते देखने पर व्यक्ति का जीवन धनधान्य से पूर्ण रहेगा।   
* दिन में दिखे स्वप्न निष्फल होते हैं।   
* सपनों में मनुष्य की रुचि हमेशा से ही है। हमारे वेदों-पुराणों में भी सपनों के बारे में जिक्र किया गया है। यदि कोई बुरा स्वप्न दिखाई दे, तो नींद खुलते ही गायत्री मंत्र पढ़कर पानी पी लेना चाहिए। उसी समय हनुमान चालीसा का पाठ अवश्य करना चाहिए और फिर नहीं सोना चाहिए। 
  Change of Name and Fate - नाम परिवर्तन और भाग्य :

   एक समय वह भी था जब लोग अपने नाम के बजाए काम पर अधिक ध्यान दिया करते थे, परंतु इस संबंध में लोगों की बदलती हुई प्रवृत्ति को देखकर लगता है कि अब उनके लिए नाम का महत्व पहले की अपेक्षा बहुत ज्यादा हो गया है और इसीलिए वे अपने पहले रखे गए नामों में परिवर्तन करने लगे हैं।   अब प्रश्न आता है कि लोगों को नाम बदलने की जरूरत क्यों पड़ती है! वास्तव में इस प्रश्न के कई पहलू हैं। नाम परिवर्तन के ज्यादातर मामलों में लड़कियाँ ही अपना नाम बदल रही होती हैं और इसका सबसे बड़ा कारण तो यही है कि करीब-करीब सभी धर्मों में विवाह से पहले लड़कियों के नाम के साथ जहाँ पिता का उपनाम या कुलनाम (सरनेम) लगता है वहीं विवाह के उपरांत पति का कुलनाम लगने लगता है। ऐसे मामलों में सामान्यतः उनका उपनाम ही बदलता है। तथापि कुछ परिवारों में विवाह के बाद लड़की का नाम बदलने की परंपरा होती है।   कुछ मामलों में लोग इसलिए भी नाम बदलते हैं क्योंकि उनके नाम में पिता का नाम या उनका कुलनाम नहीं जुड़ा होता। शुरू में तो इस बात पर ध्यान नहीं दिया जाता, लेकिन बाद में बड़े होने पर अथवा जरूरत पड़ने पर उन्हें यह अनुभव होता है कि उनका कुलनाम भी नाम के साथ होना चाहिए। अतः लोग अपना नाम परिवर्तन कर लेते हैं।          कभी-कभी ऐसा भी होता है कि बचपन में रखे गए पिंकी, पिंकू, मुन्ना, मुन्नी, पप्पू आदि जैसे बच्चों के प्यार के नाम ही जन्म प्रमाण पत्र या स्कूल के प्रमाण पत्रों में यह सोचकर दर्ज करवा दिए जाते हैं कि फिलहाल तो यही रहने देते हैं, कुछ समय बाद बदल देंगे, लेकिन समय बीतता रहता है और अभिभावक को नाम बदलना याद ही नहीं रहता। ऐसे में बड़े होने पर बच्चों को अपने ही नाम से शर्म आने लगती है। अतः इस स्थिति से छुटकारा पाने के लिए भी लोग अपना नाम बदल देते हैं।   कई बार लोग किसी ज्योतिषी की सलाह पर भाग्य की दृष्टि से भी अपने नाम में परिवर्तन कर लेते हैं। ऑल इंडिया फेडरेशन ऑफ एस्ट्रोलॉजर्स सोसाइटी के अध्यक्ष अरुण कुमार बंसल इस बारे में जानकारी देते हैं कि ज्योतिष में नाम बहुत महत्वपूर्ण होता है। नाम वह होता है जिसे सुनकर व्यक्ति या पशु जाग जाए या मुड़कर देखने लगे। व्यक्ति का नाम बार-बार बोला जाता है, इसलिए उसका बहुत प्रभाव हमारे ऊपर पड़ता है।   बंसल के अनुसार 'ज्योतिष में नाम का केवल प्रथम अक्षर ही अधिक महत्वपूर्ण होता है, परंतु अंकशास्त्र में पूरे नाम की वर्तनी का महत्व होता है। लोग अपने मूलांक और भाग्यांक को ध्यान में रखते हुए नाम रखने का प्रयास करते हैं। यदि किसी का नाम इनके अनुरूप न हो तो वह अपना नाम बदलने की सोचता है। वैसे ज्योतिषीय दृष्टि से नाम बदलने का चलन ज्यादातर उच्च वर्ग के लोगों में ही अधिक देखा जाता है।'   ज्योतिषीय कारणों से लोग कभी तो अपना पूरा नाम ही बदल डालते हैं या कभी अपने पुराने नाम में ही थोड़ा बहुत हेरफेर अथवा वर्तनी में परिवर्तन कर देते हैं। ऐसे लोग नाम परिवर्तन करने के लिए कभी उसमें कुछ जोड़ते हैं तो कभी कुछ घटाते हैं। कभी-कभार लोग इसलिए भी नाम आंशिक परिवर्तन करते हैं क्योंकि उनके पुराने नाम की वर्तनी गलत होती है और जब उन्हें इस बात का ज्ञान होता है तो वे भी मानने लगते हैं कि गलत वर्तनी वाला नाम उनके व्यक्तित्व में बाधा डाल रहा है। इस प्रकार के मामलों में भी लोग अपना नाम बदल लेते हैं।   यूँ तो नाम रखना या उसमें परिवर्तन करना पूरी तरह से व्यक्तिगत होता है और कोई भी कभी भी अपना नाम परिवर्तन कर सकता है लेकिन जहाँ तक सरकारी दस्तावेजों, प्रमाण पत्रों, खातों आदि में नए नाम के अनुसार परिवर्तन करवाने की बात है तो इसके लिए अनिवार्य रूप से कुछ नियमों का पालन करना पड़ता है। नाम परिवर्तन के लिए व्यक्ति को इस संबंध में 'एफिडेविट' के साथ-साथ किन्हीं दो राष्ट्रीय समाचार पत्रों में अपने बारे में बताते हुए इस बात की जानकारी देनी पड़ती है।   
Surya Ke Sankraman Kaal Ka Parv - सूर्य के संक्रमण काल का पर्व :
 

- मकर संक्रांति    मकर संक्रांति को सूर्य के संक्रमण काल का त्योहार भी माना जाता है। एक जगह से दूसरी जगह जाने अथवा एक-दूसरे का मिलना ही संक्रांति होती है। सूर्य जब धनु राशि से मकर पर पहुँचता है तो मकर संक्रांति मनाते हैं।  सूर्य के राशि परिवर्तन को संक्रांति कहते हैं। यह परिवर्तन मास में एक बार आता है। सूर्य के धनु राशि से मकर राशि पर जाने का महत्व, इसलिए अधिक है कि इस समय सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण हो जाता है। उत्तरायण देवताओं का अयन है। यह पुण्य पर्व है। इस पर्व से शुभ कार्यों की शुरुआत होती है। उत्तरायण में मृत्यु होने से मोक्ष प्राप्ति की संभावना रहती है। पुत्र की राशि में पिता का प्रवेश पुण्यवर्द्धक होने से साथ-साथ पापों का विनाशक है।   इस दिन प्रातःकाल उबटन आदि लगाकर तीर्थ के जल से मिश्रित जल से स्नान करें। यदि तीर्थ का जल उपलब्ध न हो तो दूध, दही से स्नान करें। किंतु तीर्थ स्थान या पवित्र नदियों में स्नान करने का महत्व अधिक है। स्नान के उपरांत नित्य कर्म तथा अपने आराध्य देव की आराधना करें।          भगवान भास्कर के दर्शन करके उन्हें अर्घ्य देना चाहिए। ताँबे के लोटे में कुंकु, रक्त चंदन, लाल पुष्प आदि मिश्रित जल से पूर्व मुखी होकर तीन बार सूर्य को जल दें। पश्चात अपने स्थान पर ही खड़े होकर सात परिक्रमा करें। उसके बाद सूर्याष्टक, गायत्री मंत्र तथा आदित्य हृदय स्रोत का पाठ करें।      पाठ के बाद देवदर्शन कर देवताओं के निमित्त पूजन सामग्री, मुद्रा आदि चढ़ाएँ तथा गौ एवं पक्षियों को चारा, अनाज, तिल गुड़ आदि खिलाएँ। अपने परिचितों, संबंधियों मित्रों आदि को उनकी पात्रता तथा अपनी क्षमता अनुसार तिल गुड़ से बने खाद्य पदार्थ, खिचड़ी, वस्त्र, सुहाग सामग्री, मुद्रा आदि का दान करें।   ज्योतिष विज्ञान में सूर्य का विशेष महत्व है। सूर्य पूर्व दिशा का पुरुष, रक्त वर्ण, पित्त प्रकृति और क्रूर ग्रह है। सूर्य आत्मा, स्वभाव, आरोग्यता, राज्य और देवालय का सूचक तथा पितृ कारक है। सूर्य आत्मबल का, आत्मविश्वास का कारक है। सूर्य का- नेत्र, कलेजा, मेरुदंड आदि पर विशेष प्रभाव पड़ता है इससे शारीरिक रोग, सिरदर्द, अपचन, क्षय, महाज्वर, अतिसार, नेत्र विकार, उदासीनता, खेद, अपमान एवं कलह आदि का विचार किया जाता है।   सूर्य एक माह में अपनी राशि बदलता है। सूर्य जब भी किसी भी राशि में प्रवेश करता है तो उस दिन को राशि की संक्रांति कहते हैं। मकर संक्रांति को सूर्य के संक्रमण काल का त्योहार भी माना जाता है। एक जगह से दूसरी जगह जाने अथवा एक-दूसरे का मिलना ही संक्रांति होती है। सूर्य जब धनु राशि से मकर पर पहुँचता है तो मकर संक्रांति मनाते हैं।   पुण्यकाल में दाँत माँजना, कठोर बोलना, फसल तथा वृक्ष का काटना, गाय, भैंस का दूध निकालना व मैथुन काम विषयक कार्य कदापि नहीं करना चाहिए। सूर्य पूर्व दिशा से उदित होकर 6 महीने दक्षिण दिशा की ओर से तथा 6 महीने उत्तर दिशा की ओर से होकर पश्चिम दिशा में अस्त होता है। उत्तरायण का समय देवताओं का दिन तथा दक्षिणायन का समय देवताओं की रात्रि होती है, वैदिक काल में उत्तरायण को देवयान तथा दक्षिणायन को पितृयान कहा गया है। मकर संक्रांति के बाद माघ मास में उत्तरायण में सभी शुभ कार्य किए जाते हैं।   वृषभ, सिंह, वृश्चिक, कुंभ, संक्रांति विष्णुपद संज्ञक है। मिथुन, कन्या, धनु, मीन संक्रांति को षडशीति संज्ञक कहा है। मेष, तुला को विषुव संक्रांति संज्ञक तथा कर्क, मकर संक्रांति को अयन संज्ञक कहा गया है। महाभारत के युद्ध में जब भीष्म पितामह को मृत्यु शैया पर लेटना पड़ा था, तब अपनी इच्छामृत्यु के लिए उन्होंने इसी उत्तरायण की प्रतीक्षा की थी, इसलिए उत्तरायण पर्व को भीष्म पर्व भी कहते हैं। मकर संक्रांति के दिन भीष्म पितामह ने शरीर का त्याग किया था।   
 Birth in the Month of December - दिसंबर में जन्मे व्यक्तियों का व्यक्तित्व :

   दिसंबर माह में जन्मे व्यक्ति स्पष्टवादी मुँहफट होते हैं। ऐसे व्यक्ति अपने काम में सीधा लक्ष्य बेध करते हैं। इन्हें स्पष्ट बोलने की आदत होती है अतः ये कभी-कभी दुश्मन भी पाल लेते हैं। ऐसे व्यक्ति अपना सारा ध्यान उस क्षण कर रहे काम पर केंद्रित रखते हैं और जब तक पूरे प्रयास कर थक नहीं जाते किसी दूसरी ओर निगाह भी नहीं करते हैं।   इनके मस्तिष्क में इतनी शीघ्रता से विचार कौंधते हैं कि वे प्रायः दूसरों के वार्तालाप में बीच में टपक पड़ते हैं और धीरे या रुककर बोलने वालों के प्रति अधीरता प्रकट करते हैं। ये सत्यवादी होने से वे दूसरों को छलने के प्रयासों का भंडाफोड़ कर देते हैं, भले ही उनका यह कार्य अपने हितों के विरुद्ध हो। ये अपने काम में तब तक विश्राम नहीं लेते, जब तक थक नहीं जाते।   व्यापार या अन्य किसी कार्य में भारी उद्यमी होते हैं लेकिन अपने को कभी एक ढंग के काम से बंधा महसूस नहीं करते अतः वे तेजी से अपने विचार बदलते रहते हैं। राजनीतिज्ञ के रूप में वे अपनी नीतियों में अनेक बार बदलाव करते हैं। यदि धर्म प्रचारक के रूप में हो तो धर्म के बारे में अपने विचार बदल सकते हैं। ऐसे जातक अभिमानी इतने होते हैं कि अपनी गलती को स्वीकार नहीं करते।          यदि ऐसे व्यक्ति महसूस करें कि अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकते तो बीच में ही रुक जाते हैं। अपनी महत्वाकांक्षा को छोड़कर, नया कार्य भी शुरू कर सकते हैं। इस माह में जन्मे स्त्री हो या पुरुष, भावुकता में बहकर विवाह कर तो लेते हैं लेकिन बाद में पछताते भी हैं।   अभिमानी स्वभाव होने से अपनी गलती स्वीकार नहीं करते हैं और अन्य उनके वैवाहिक जीवन को आदर्श समझ बैठते हैं। ऐसे व्यक्ति कानून और व्यवस्था के पक्के समर्थक होते हैं। पूजा स्थलों पर नियमित रूप से जाते हैं। ऐसे जातक भारी लोकप्रियता प्राप्त करते हैं और जन आदर्श बन जाते हैं और उन पर यश तथा पद थोंप दिए जाते हैं।   इस मास में जन्मी महिलाएँ पुरुषों से अधिक उदात्त होती हैं। अपने पति और बच्चों की सफलता के लिए जितना कर सकती हैं, करती हैं और आत्मत्याग को तैयार रहती हैं। घर से उन्हें गहरा प्रेम होता है। उनमें सम्मान और कर्तव्य के प्रति ऊँची समझ होती है लेकिन जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण बहुत स्वतंत्र होता है। ऐसे लोग एक पल में संवेदनशील, दूसरों के बहकावे में आने वाले और शांत हो सकते हैं। दूसरे ही क्षण वे पूर्ण आवेशी और दुस्साहसी हो सकते हैं।   सत्य, शांति और न्याय के पक्षधर होने के कारण उनका सच्चा धंधा पीड़ितों की सेवा है। सताए हुए और दबाए हुए लोगों के साथ उनकी प्रबल सहानुभूति होती है। कभी न कभी वे किसी मानवीय या सुधार कार्य में अपना झंडा गाड़ते हैं। उनमें परिहास की गहरी समझ होती है और तर्क करना पसंद करते हैं।   वस्तुतः वे मित्रों में वाद-विवाद की असाधारण कुशलता के लिए जाने जाते हैं। खुली हवा और घर से बाहर आमोद-प्रमोद के शौकीन होने के कारण वे जंगली ऊबड़-खाबड़ पर्वतीय प्रदेश की खोज करते या वहीं विचरण करते अपने स्वाभाविक रूप में होते हैं। ये स्पष्ट, खुले दिलवाले और बहुत उदार होते हैं। इनका व्यवहार आमतौर पर विनम्र होता है।   इनमें उच्च कोटि का पूर्वाज्ञान रहता है और गुप्त ज्ञान तथा मन विषयक मामलों में अभिरुचि प्रदर्शित करते हैं। ये संगीत और साहित्य के प्रेमी होते हैं तथा इनमें दखल भी रखते हैं। इन्हे मादक पदार्थों से बचना चाहिए एवं प्रातः टहलना इनके लिए उत्तम रहेगा।   शवासन इनके लिए सबसे उपयुक्त रहेगा। शरीर को ढीला छोड़कर गहरी श्वास लेना व धीरे-धीरे छोड़ना उपयुक्त रहेगा। धन के मामलों में इन्हें सावधानी रखनी चाहिए। इनके अच्छे मित्र मेष, सिंह, मिथुन, मीन राशि वाले होंगे एवं साझेदारी व वैवाहिक तालमेल भी इन्हीं राशियों वाले से उत्तम रहेगा।   
  Vivah Ke Kuchch Shastriya Niyam - विवाह के कुछ शास्त्रीय नियम 

        गृहस्थ आश्रम में प्रवेश के लिए प्रमुख संस्कार विवाह संस्कार है। इसे हमारे नीतिक ग्रंथों में संस्कार की संज्ञा दी गई है जिसका मुख्य उद्देश्य जीवन को संयमित बनाकर संतानोत्पत्ति करके जीवन के सभी ऋणों से उऋण होकर मोक्ष के लिए कर्म करें। इसलिए विवाह में ये नियम निर्धारित किए गए हैं।  * वर-वधू दोनों सगोत्रीय अर्थात एक गोत्र के नहीं होने चाहिए।   * वधू का गोत्र एवं वर ननिहाल पक्ष का गोत्र एक ही नहीं होना चाहिए।   * दो सगी बहनों का विवाह दो सगे भाइयों से करना भी शास्त्रों में निषिद्ध है।   * दो भाइयों का, दो बहनों का अथवा भाई-बहनों के विवाह में 6 मास का अंतर होना चाहिए।          * कुल में विवाह होने के 6 माह के भीतर मुंडन, यज्ञोपवीत (जनेऊ संस्कार) चूड़ा आदि मांगलिक कार्य नहीं करना चाहिए। किंतु 6 मास के भीतर ही यदि संवत्सर बदल जाता है तो ये कार्य किए जा सकते हैं।   * वैवाहिक अथवा अन्य मांगलिक कार्यों के मध्य श्राद्ध आदि अशुभ कार्य करना भी शास्त्रों में वर्जित है।   * वर, कन्या के विवाह के लिए गणेश पूजन हो जाने के पश्चात यदि दोनों में से किसी के भी कुल में कोई मृत्यु हो जाती है तो वर, कन्या तथा उनके माता-पिता को सूतक नहीं लगता है तथा निश्चित तिथि पर विवाह कार्य किया जा सकता है।   * वाग्दान अथवा लगन चढ़ जाने के पश्चात परिवार में कोई मृत्यु होने पर सूतक समाप्त होने अथवा सवा माह के पश्चात विवाह करने में कोई दोष नहीं लगता है।  
  Saptamesh Chandra Dwadash Me Ho to - सप्तमेश चंद्र द्वादश में हो तो लव मैरेज  :

   सप्तमेश चंद्रमा मकर लग्न में होगा। सप्तम भाव पत्नी, सेक्स, दैनिक व्यवसाय का कारक भी माना जाता है। सप्तमेश नवम भाव में नवमेश बुध के साथ हो तो भाग्यशाली होगा। ऐसे जातक पन्ना अवश्य पहनें। चंद्र के साथ सूर्य हो तो भाग्योन्नति में थोड़ी बाधा का कारण बनता है। चंद्र के साथ मंगल हो तो पराक्रमी‍ जनता में प्रसिद्ध, आय अच्छी होती है। गुरु साथ हो तो धर्मनिष्ठ तो होता है लेकिन मिले-जुले परिणाम मिलते हैं। शुक्र साथ हो तो पराक्रम से लाभ मिले ऐसे जातक को हीरा 30 सेंट का अवश्य पहनना चाहिए।   शनि साथ हो तो भाग्य साथ देता है। प्रयत्न अधिक करना पड़ते हैं। राहु साथ होने पर गुप्त युक्तियों से सफलता मिलती है। ऐसा जातक चतुर चालाक होता है। केतु साथ हो तो भाग्य में अवरोध आते हैं। चंद्रमा दशम भाव में हो तो पत्नी या पति सर्विस में होगा। शुक्र साथ हो तो सुंदर होने के साथ-साथ सौंदर्य प्रसाधनों से, कला से संबंधित, मिष्ठान्न, सोना-चाँदी के कार्य से लाभ मिलें।   चंद्र सूर्य साथ हो तो व्यापार, नौकरी, राज्य से हानि होती है। चंद्र के साथ मंगल हो तो माता से, भूमि से, जनता के कार्य से लाभ पाता है लेकिन पिता से, अधिकारी से अनबन रह सकती है। बुध साथ हो तो साधारण लाभ रहता है। शनि साथ हो तो शासकीय, राजनीति में सफलता मिलती है। उच्च प्रशासनिक सर्विस में लोहे आदि के कार्य में सफल हो। पिता की उम्र अधिक हो। राहु चंद्र साथ हो तो व्यापार में, नौकरी में चिंता का कारण बने। ऐसे जातक हीरा पहने तो लाभ मिले। केतु साथ होने पर विशेष लाभ नहीं रहे।             चंद्र सप्तमेश होकर एकादश में हो तो पत्नी या पति तुनकमिजाज वाला होगा। आर्थिक खर्च अधिक हो। मंगल साथ हो तो धन अच्छा हो। संतान से विद्या से लाभ हो। सूर्य साथ हो तो आय में कम‍ी हो शेयर बाजार में घाटा होता है। गुरु साथ हो तो आय में स्वप्रयत्नों से अच्छा लाभ मिलता है। भाई-मित्र से लाभ हो। बाहरी संबंध अच्छे हों। बुध साथ हो तो भाग्य से धन अच्छा मिलता है।   शुक्र साथ हो तो सेक्सी हो, स्त्रियों पर धन बरबाद हो। शनि साथ होने पर स्वप्रयत्नों से मिली-जुली आय होती है। राहु साथ हो तो अकस्मात खर्चे हों। केतु साथ हो तो अकस्मात धन लाभ मिले। चंद्रमा सप्तमेश होकर द्वादश में हो तो पत्नी बाहर से मिले या लव मैरेज भी हो सकती है।   चंद्र के साथ सूर्य हो तो बाहरी संबंध ठीक नहीं रहे। गुरु साथ सूर्य हो तो यात्रा अधिक हो। पत्नी धर्मनिष्ठ हो। बाहरी संबंध अच्छे हों। मान-प्रतिष्‍ठा अच्छी मिले। शुक्र साथ हो तो भोग- विलास की सामग्री मिले। शनि साथ हो तो विदेश गमन हो या जन्म स्थान से दूर हो। मंगल साथ हो तो विदेश में रहे, शत्रु न हो, पत्नी साहसी हो। लेकिन क्षति भी संभव है। राहु साथ हो तो पत्नी की वाणी ठीक न हो व चरित्र भी संदिग्ध हो। केतु साथ हो तो बाहर से अच्छा लाभ मिले।  
Saptmesh Chandra Ekadash Me - सप्तमेश चंद्र एकादश में हो तो:

 पत्नी से नुकसान हो     सप्तमेश चंद्र मकर लग्न में होगा। सप्तमेश पत्नी भाव व दैनिक व्यवसाय का माना जाता है। इस भाव से सेक्स भी देखा जाता है। चंद्र की गति अन्य ग्रहों से सबसे ‍तेज है। यह मन का कारक है। सप्तमेश चंद्र नवम भाव में हो तो उस जातक को विवाह बाद पत्नी से लाभ होगा। यदि बुध भी साथ हो तो ऐसा जातक पत्नी व दैनिक व्यवसाय के मामलों में भाग्यशाली होगा।   ऐसे जातक सवा पाँच रत्ती का पन्ना पहने तो अति शुभ रहेगा। चंद्र के साथ मंगल का होना आय में वृद्धिदायक होगा। माता से लाभ भूमि-भवन से युक्त होगा। सूर्य साथ हो तो भाग्य पक्ष में बाधा का कारण बनता है। गुरु साथ में हो तो अपने पराक्रम से लाभ मिलें। भाइयों, मित्रों से लाभ रहे। शुक्र साथ होने पर नीच का होगा। विद्या में, राज्य में, नौकरी में पिता से हानि रहती है अत: ऐसे जातक 30 सेंट का हीरा पहनें। शनि साथ होने पर ऐसा जातक धर्मनिष्ठ, भाग्यशाली रहेगा।   राहू साथ हो तो 26 वर्ष बाद सफलता मिले। ऐसे जातक उत्तम धार का गोमेद पहनें। केतु साथ होने पर भाग्य में बाधा आए। उन्हें कुत्ते को मीठी रोटी खिलाना लाभदायक होगा। सप्तमेश चंद्र दशम में हो तो पत्नी सर्विस करने वाली होगी। शुक्र साथ होने पर उसका जीवनसाथी सुंदर होगा। ऐसे जातक आभूषण, कलात्मक वस्तु, इत्र, कॉस्मेटिक, इलेक्ट्रॉनिक्स के व्यापार में सफल होते है। मिष्‍ठान्न भंडार में भी सफल रहेंगे। सूर्य साथ हो तो व्यापार में क्षति, राज्य पक्ष से दंड‍ मिले। पिता से हानि हो। ऐसे जातक सूर्य को प्रात: जल चढ़ावें।        मंगल साथ हो तो माता, जनता से संबंधित कार्य से लाभ मिले। बुध साथ हो तो भाग्य बल से सफल हो। गुरु साथ होने पर साधारण किस्म का गजकेसरी योग बनेगा व मध्यम ही लाभ होगा। शनि साथ होने पर ऐसा जातक प्रशासनिक सेवा में, इंजीनियर में सफल होता है। राजनीति में भी सफलता पा सकता है। राहू साथ होने पर विशेष लाभ वाली बात नहीं। केतु हो तो पिता न रहे। नौकरी आदि में उतार-चढ़ाव रहे। चंद्रमा की स्थिति एकादश में हो तो पत्नी से नुकसान रहे या पत्नी अस्वस्थ रहे जिससे खर्चे बढ़े।   संतान विद्या अच्छी हो। मंगल साथ हो तो आर्थिक लाभ ठीक रहे। सूर्य साथ होने पर अधिक नुकसान हो। बुध साथ हो तो भाग्य बल से धन लाभ रहे। गुरु साथ होने पर श्रेष्‍ठ फल मिले। आय भी उत्तम हो। शुक्र साथ हो तो भोग-विलास पर खर्च होगा। शनि साथ हो तो स्वप्रयत्नों से लाभ मिलें। राहू साथ हो तो आकस्मिक खर्चे रहे। धन हानि भी रहे। केतु साथ हो तो धन लाभ अकस्मात मिलें।   चंद्र द्वादश में हो तो उस जातक का जीवनसाथी बाहर से मिले। गुरु साथ हो तो उसका जीवनसाथी श्रेष्‍ठ हो व लाभ भी रहे। सूर्य साथ होने पर सामान्य लाभ रहे। मंगल साथ हो तो विदेश से या जन्म स्थान से दूर लाभ रहे। बुध साथ हो तो भाग्य विदेश में या जन्म स्थान से दूर चमकेगा। शुक्र साथ हो तो विद्या हेतु बाहर जाना पड़े। शनि साथ हो तो धन की
 अचूक टोटके आजमाएं और पाएं सफलता
मनुष्य अपने जीवन में आ रही समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए अगर कुछ तरीके आजमाए तो उनसे जल्द छुटकारा पा सकता है. पेश हैं कुछ अचूक टोटके-
घर में पैसा बचायें इस तरह भी
आप पैसा बचाने के पक्ष में हैं और अधिक से अधिक धन कमाने के बाद भी कुछ बचा नहीं पा रहे हैं और घर में बरकत नही हो रही हो,पैसे कब आते हैं, कब चले जाते हैं कोई हिसाब-किताब नहीं तो इस उपाय को आजमायें-मंगलवार के दिन लाल चंदन,लाल गुलाब के फूल तथा रोली लें. इन सब चीजों को लाल कपड़े में बांधकर एक सप्ताह के लिए मंदिर में रख दें. घर पर धूपबत्ती किया करें. एक सप्ताह के बाद उनको घर की तथा दुकान की तिजोरियों में रख दें आप देखेंगे कि आपकी इच्छा साकार होने लगी है.
घर में इस तरह लायें खुशहाली
अगर आप अपने घर में खुशहाली लाना चाहते हैं व शांति बनाये रखना चाहते हैं तो यह उपाय करें-शुक्ल पक्ष के बृहस्पति को यह क्रिया शुरू करें तथा 11 बृहस्पतिवार तक लगातार करें. घर या व्यापार स्थल के मुख्य द्वार के एक कोने को गंगा जल से धो लें. इसके बाद स्वास्तिक बनाएं. उस पर चने की दाल तथा थोड़ा-सा गुड़ रख दे. इसके बाद स्वास्तिक को बार-बार देखें. अगर वह खराब हो जाए तो सामान को इकट्ठा करके जल प्रवाह करें.11 बृहस्पतिवार के बाद गणेश जी को सिंदूर लगाकर उनके सामने पांच लड्डू रखें तथा घर में खुशहाली व शांति का माहौल बनने लगेगा.
बेरोजगार हैं तो यह करें....
अगर आपके लाख प्रयत्न करने के बाद भी आप अभी तक बेरोजगार हैं और आपमें ही भावना घर कर गई है तो यह करें-एक बिना दाग वाला पीला नींबू लें, उसके चार बराबर टुकड़े कर लें. जब दिन ढल जाये तब चौराहे पर जाकर चारों दिशाओं में उन्हे एक-एक फेंक दें और बिना पीछे मुड़े देखे घर आ जायें. आपको शीध्र ही लाभ होगा. यह प्रयोग सात दिन लगातार करें. आपका काम शीध्र बनेगा व आपको रोजगार मिलेगा.
कार्य में सफलता पाएं इस तरह भी
अगर आप किसी कार्य से जा रहे हैं और चाहते हैं कि उस कार्य में आपको सफलता मिले तो एक नीले रंग का धागा लेकर घर से निकलें. घर से जो तीसरा खंभा आपको दिखे उस पर अपना काम कहकर वह नीले रंग का धागा वहां बांध दें. आपके काम के सफल होने की संभावना बढ़ जायेगी और आपका काम सफल होगा.
व्यापार में हानि होने पर यह करें
जिन व्यापारियों का व्यापार चलते-चलते ठप्प गया हो तथा लाख प्रयत्न करने के बाद भी नहीं चल रहा हो तथा व्यापारी को यह किसी के किये कराये का परिणाम है तो वह यह करें. प्रत्येक मंगलवार को 11 पीपल को पत्ते लें. उनके गंगाजल से अच्छी तरह से धोकर लाल चंदन से हर पत्ते पर सात बार राम-राम लिखें. इसके बाद हनुमान जी के मंदिर में चढ़ा आएं तथा प्रसाद बांटे और इस मंत्र का जाप,जितना कर सकते हैं,करें. इस उपाय को सात मंगलवार लगातार करें अगर हो सके तो इसे गुप्त रखें.
प्रेम विवाह में सफलता पाएं इस प्रयोग से
अगर आप किसी से प्रेम करते हैं और उससे प्रेम विवाह करना चाहते हैं तो भगवान विष्णु और लक्ष्मी की मूर्ति या तस्वीर के सम्मुख,शुक्ल पक्ष में गुरूवार से शुरू करें. लक्ष्मीनारायण नम: मंत्र का रोज तीन माला जाप, स्फटिक माला या लक्ष्मी वरवरद माला से करें. तीन महीने तक हर गुरूवार मंदिर में प्रसाद चढ़ाएं और विवाह हो जाने की प्रार्थना करें. मनोवंछित फल प्राप्त होगा.

कर्ज से छुटकारा पाएं इस तरह भी
कर्ज नाम सुनते ही दिलोदिमान पर एक बैचेनी छा जाती है. चिंताएं अपना आकार विशाल बनाने लगती है. किसी कार्य में मन नहीं लगता सिर्फ एक ही भूत याद रहता है कर्ज-कर्ज-कर्ज . तो यह उपाय करें-
रिक्ता तिथि,यम घंटक काल, भद्रा, राहु काल को त्याग कर शुभ तिथि, शुभ वार में यह  प्रयोग करें.
डेढ़ मीटर सफेद कपड़ा चौकी पर बिछा लें. पूर्व में मुंह करें तथा पांच खिले हुए साबुत गुलाब के फूल, लक्ष्मी या गायत्री मंत्र पढ़ते हुए एक-एक करके सफेद कपड़े पर रखते हुए तथा फिर हल्के हाथ से कपड़े को गुलाब के फूल सहित बांध लें. इस बंधे हुए कपड़े को गंगा या यमुना नदी में प्रवाहित कर आयें.ऐसा अपनी सुविधाकार सात बार करें. माता लक्ष्मी सहयोग देगी आपकी स्थिति में सुधार होगा तथा कर्ज से मुक्ति मिलेगी.
अगर विदेश जाना चाहते हैं तो यह करें.
अगर आपकी ख्वाहिश विदेश यात्रा की है तो यह प्रयोग कर आप लाभ उठा सकते हैं. किसी भी संक्रांति के दिन, सफेद तिल और थोड़ा गुड़ लें. सूर्यास्त के समय एक मिट्टी के कुल्हड़ में डालकर उस कुल्हड़ को पीपल के एक स्वयं गिरे हुये पत्ते से ढक लें. फिर किसी आक के पौधे की जड़ में रख आएं. आते समय पीछे मुड़कर न देखें. घर में आकर स्नान जरूर कर लें. नहाने के पानी में थोड़ा सा शुद्ध केसर मिला लें.यह प्रयोग अपने गुरू का आशीर्वाद लेकर करें ताकि जल्दी सफलता मिले.
आलस्य दूर करें इस तरह
यदि किसी व्यक्ति को ऐसा महसूस हो कि आलस्य प्रमाद के कारण उसे वांछित सफलता नहीं मिल रही है या उसका मन कामकाज में नहीं लग रहा है तो उसे कटेरी की जड़ शहद में पीस लेनी चाहिए तथा मात्र इसके सूंघने से आलस्य प्रमाद से राहत मिलेगी, आप ऊर्जावान होंगे.
ऐसे करें कठिन कार्यो में सफलता प्राप्त
यदि आपको किसी कार्य विशेष में अनेक बार प्रयास करने पर भी सफलता महीं मिल रही हो तो यह प्रयोग अवश्य आजमायें. किसी भी प्रकार के कठिन कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए तंत्र शास्त्रों में निम्नलिखित तंत्र प्रयोग बताया गया है-किसी कठिन कार्य की सिद्धी के लिये जाते समय घर से निकलने से पूर्व ही एक मुर्गी का अण्डा लाकर उसमें सावधानी से एक बड़ा सा छेद करें फिर उस अण्डे को एक कोरे मिट्टी के पात्र में रख कर छेद करें फिर उस अण्डे को एक कोरे मिट्टी के पात्र में रख कर छेद में एक हत्था जोड़ी रख कर वह पात्र अपनी छत पर रख दें.
इसके उपरांत अपने हाथ में एक मुट्ठी काले तिल लेकर घर से निकलें. मार्ग में जहां भी कुत्ता दिखाई दे उस कुत्ते के सामने वह तिल डाल दें और आगो बढ़ जाये. इससे कठिन कार्यो में भी सफलता प्राप्त होती है. यदि वह काले तिल कुत्ता खाता हुआ दिखाई दे तो यह समझना चाहिये कि कैसा भी कठिन कार्य न हो,उसमें सफलता प्राप्त होगी.
 का धन
धन भाव बताता है आर्थिक योग
द्वितीय भाव धन व आर्थिक स्थिति को बताता है। इससे परिवार सुख व पैतृक संपत्ति की भी सूचना मिलती है। द्वितीय भाव में जो राशि होती है, उसका स्वामी द्वितीयेश कहलाता है। इसे धनेश भी कहते हैं।
1. धनेश लग्न में होने से परिवार से प्रेम रहता है, आर्थिक व्यवहार में पटुता हासिल होती है।
2. धनेश धन स्थान में हो तो परिवार का उत्कर्ष होता है व आर्थिक स्थिति हमेशा अच्‍छी रहती है।
3. धनेश तृतीय में हो तो भाई-बहनों की उन्नति व लेखन से आर्थिक लाभ का सूचक है।
4. धनेश चतुर्थ में हो तो माता-पिता से सतत सहयोग व लाभ मिलता है, चैन से जीवन बीतता है।
. धनेश पंचम में हो तो कला से धनार्जन, संतान के लिए सतत खर्च करना पड़ता है।
6. धनेश षष्ठ में हो तो कमाया गया धन बीमारियों के लिए खर्च होता है, अतिविश्वास से धोखा होता है।
7. धनेश सप्तम में हो तो पत्नी/पति व घर के लिए ही सारा धन खर्च होता रहता है।
8. धनेश अष्टम में हो तो गलत तरीके से पैसा कमाने की वृत्ति रहती है व उससे आरोप-प्रत्यारोप लगते हैं।
9. धनेश नवम में हो तो आर्थिक योग उत्तम, व्यवसाय के लिए दूर की यात्रा के योग आते हैं।
10. धनेश दशम में होने पर नौकरी से लाभ, पैतृक संपत्ति भरपूर मिलती है।
11. धनेश ग्यारहवें स्थान में होने पर मित्र-संबंधियों से सतत सहयोग व लाभ मिलता है।
12. धनेश व्यय में हो तो बीमारी, कोर्ट-कचहरी में धन व्यय होता है। दान-धर्म में भी खर्च होता है।